” मै कौन हूँ ? “

स्वामी गोविंददेव गिरी जी के सिंगापुर में हुए प्रवचन पश्चात,
मेरे अनुज प्रिय अनिल ने दूसरा प्रश्न पूछा था,  ” 

मै कौन हूँ ? “
“क्या मैं शरीर हूँ ? ” “क्या मैं आत्मा हूँ ? “
” यदि मैं शरीर अथवा आत्मा नहीं हूँ, तो क्या हूँ ???
1. Swami Govinddev Giri ji has rightly recalled that रमनमहर्षि     ने साधना-शोध इसी प्रश्न ” मैं कौन हूँ ?” पर किया।
    Dr. S. Radhakrishnan would go and sit for hours and
    draw inspirations from the vibrations pervading in
    ashram of रमन महर्षि।
    Dr. Radhakrishnan was of the view that what he taught
    to students of Philosophy, Sri Raman Maharshi had
    practised in his मौन साधना।
2. हम गृहस्थ साधकों के लिए पूज्य बाबूजी ने हनुमानजी महाराज के
    फोल्डर में सोमवार का प्रारम्भ दार्शनिक विचार से किया है ।
    श्री हनुमानजी का श्रीराम से कथन है : ” देहदृष्ट्या तु दासोSहं …..”
    अर्थात देह दृष्टि से आपका दास हूँ, जीव दृष्टि से आपका अंश हूँ,
    आत्म दृष्टि से जो आप हैं, वही मैं हूँ !
3. भावाञ्जलि भाग -2 के पेज 10 में जीवात्मा ( मै’को पहचानो ) शीर्षक
    से इस महत्वपूर्ण विषय पर पूज्य बाबू ने  पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।
4. In the ‘Sadhna Path’ published by Bhartiya Vidya Bhavan,
    in Sunday sadhna, under heading “परमात्मा,जगत,जीवात्मा ”     Pujya Babuji has dealt the subject by quoting from both
    रामचरित मानस and श्रीमद्भगवतगीता :—
    ईश्वर अंश जीव अविनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी।।
     सो माया बस भयहु गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं।।
     उपद्रष्टानुमानता च भर्ता भोक्ता महेश्वर । 
     परमात्मेति चाप्युक्तो देहेSस्मिन्पुरुष परः।।
5. गोस्वामी तुलसीदासजी ने ‘ तू दयालु दीन हों ‘ पद के अंतिम भाग में
    निवेदन किया है :–
    “तोहि मोहि नाते अनेक, मानिए जो भावे, 
     ज्योँ त्यों तुलसी कृपाल, चरण शरण पावे।।”
6. पूज्य बाबूजी की 1950-52 की भक्ति रचना है :–
    मैं तो तेरा हूँ, तेरा हूँ, तेरा हूँ राम !
    तू तो मेरा है, मेरा है, मेरा है राम !!  
    इसी भाव की एक और रचना उन्होंने की थी :-
     तन है तेरा, मन है तेरा ; प्राण हैं तेरे, जीवन तेरा। 
     सब हैं तेरे, सब है तेरा ; मैं हूँ तेरा, तू है मेरा।    
  7.  Let us recapitulate the fundamental principles,
       enshrined by Pujya  Babuji in the Meditation cassette.
     पूज्य बाबूजी श्रीराम के मौलिक गुणों का स्मरण करने के बाद कहते हैं :
     राम सृष्टा है, राम भरतार है, राम करतार है।
     राम सब में है,राम में सब है, राम ही सब है।
       ……………………………………………
       ……………………………………………
     राम अनुमन्ता है, राम भरता है, राम भोगता है।
     मैं कुछ नहीं करता …………………………….
     मैं यंत्र, राम यंत्री ;
     मैं काठ की पुतली, राम सूत्रधार ;
     मैं अकल खिलौना, राम खिलार।
     मेरा कुछ नहीं, सब राम का है ;
     ट्रस्टीवत सबका सदुपयोग करना है ;
     दुरुपयोग का अधिकार नहीं।
     मेरा कोई नहीं , सब राम के हैं ;
     सबकी मर्यादानुसार सेवा करना है ;
    सब राम के मंगलमय विधान से होता है ,
    जो न्याय और दया पर आधारित है।
    समर्पण भाव से, समता में रहना है !
      मुझे कुछ नहीं चाहिए ………
      मुझे राम कृपा चाहिए ………
      मुझे राम दर्शन चाहिए ……..
      मुझे राम चाहिए !
      मुझे राम चाहिए !
      मुझे राम चाहिए !
मुझे यह लगा कि प्रिय अनिल ने प्रश्न पूछ कर सिंगापुके भक्त-श्रोताओ को श्री स्वामी गोविंददेव गिरी जी अमृतमयी ज्ञान गंगा में स्नान करवाया ।
साथ ही साथ हमें अपनी पिटारी का पुनरावलोकन करने को प्रेरित किया और हम गुरुदेव की महानता-महिमा को याद कर धन्य हुए !
इन्हीं शब्दों के साथ आज के सत्संग को विराम देता हूँ !
जय सीताराम !
-Ajey.
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