” भगवान से हम कैसे जुड़ें ? “

समन्वय परिवार के मुखिया तथा निर्वर्तमान शंकराचार्य परमपूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्दजी गिरी महाराज
के सुयोग्य शिष्य, जो भारत माता  मंदिर के अध्यक्ष हैं, स्वामी गोविंददेवजी  गिरी
महाराज पिछले दिनों सिंगापुर  गए हुए थे।  उनके एक प्रवचन बाद,
मेरे अनुज प्रिय अनिल ने उनसे 2 प्रश्न पूछे थे।
पहला प्रश्न था :— ” भगवान से हम कैसे जुड़ें ? “
1. यह प्रश्न 1953 में पूज्य श्री आनंदमयी माँ से पूज्य बाबूजी ने  पूछा था।
     बाबूजी के प्रश्न का मुख्य मुद्दा ‘जुड़ना’ न होकर ‘जुड़े रहना ‘ था। पूज्य
    आनंदमयी माँ ने उन्हें ‘एक गृहस्थ माँ और शिशु’ का उदाहरण दिया था।
2. रामचरित मानस के सुन्दर काण्ड में विभीषणजी के शरण में आने पर
    श्रीराम ने उपदेश में कहा :—
     सबके ममता ताग बटोरी।  मम पद मनहि बाँध बर डोरी।।
3. All the practical and attitudinal aspects have
     been dealt up with in the meditation cassette, when
     Babuji deals with the वस्तु-व्यक्ति-परिस्तिथि,,,…………..
    one at a  time ………and links each of them with श्रीराम।
4. The book-let entitled ‘अखंड साधना’ is designed to throw
    more light on finer aspects of  नित्य एकत्व from ab initio.
5. Recalling an incidence involving  श्री रामकृष्ण परमहंस
    when a devotee complained about “no darshan” of the
     Lord  despite several years of साधना।  He asked him,
    ” आज दर्शन करना हो तो चलो मेरे साथ ! “
     What happened at गंगा स्नान is history and so also
     श्रीरामकृष्ण की उक्ति about aspiration to see HIM.
6. Swami Govinddevji has referred to the ideology followed
    by भरतजी in governing अयोध्या for almost 14 years :–
  a. नित पूजत प्रभु पावरी प्रीति न रिदय समाती ।
      मांगी मांगी आयसु करत, राजकाज बहु भाँती।।
  b. पुलक गात हिय सिय रघुबीरू ।
     जीह नाम जपि लोचन नीरू।।
  c. राम लखन सिय कानन बसहीं।
      भरत भुवन बस तप तनु कसहीं।।
 7 . स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी ने श्रीरामकृष्ण परमहंस के सुप्रसिद्ध
   उदाहरण ‘ बन्दर का बच्चा ‘ तथा ‘ बिल्ली का बच्चा ‘ का उल्लेख कर
    ज्ञानी भक्त और शरणागत भक्त की प्रवृत्ती तथा मार्ग पर चलने
    अर्थात जुड़ने की सुगमता / प्रतिकूलता का बोध कराया है।
   This was emphatically communicated when Pujya Babuji
    gifted to me ‘ The gospel of Sri Ramkrishna ‘ तथा जबलपुर
    के रविवार सत्संग में गीता पाठ और उस पर हुई व्याख्या पर
    हरिगीता के बारहवें अध्याय के पांचवें छंद में गाया :—
    ” अव्यक्त में आसक्त जो होता उन्हें अति क्लेश है……. “
8. जुड़ने का सरलतम साधन है नाम शरणागति भावमय नाम संकीर्तन :–
    तन है, तेरा मन है तेरा;
     प्राण हैं तेरे, जीवन तेरा……
9. Without casting aspersions on anyone, let me admit that
    I do strongly feel that I have not understood the
    value of the books and booklets given to me, in our
    formative age.
     Moreover, I tend to forget what I got as an endowment,
     without any extra effort.
     Of late, I have realized that this is how HE has designed
     these events. They enable us to revisit and recapitulate
     our old learnings.
    At this juncture, let me recall किष्किन्धा काण्ड में  श्री हनुमानजी
     महाराज का प्रभु श्रीराम से मिलन पर कथन ( जो वास्तव  में भक्त की मनोदशा
    का वर्णन है ) :–
   ” एक मैं मंद मोह मति, कुटिल ह्रदय अग्यान।
      पुनि प्रभु मोहि बिसरेहु दीन बंधु भगवान।।
10.  Swamiji has very humorously remarked the need for
      meditation time and to begin with finding opportunity to
      connect with HIM, doing ‘Hi’ and ‘Bye’ , while going &
      returning from office / work place.
11. Almost 2 months ago, Bhola Phuphaji sent on Whatsapp,
     a devotional song from movie राम नगरी :–
     ” मै तो कब से तेरी शरण मे हूँ ! ” इसके अँतरे के भाव बहुत सुन्दर हैं :-
     ” तेरी आरती का दिया बनूँ, यही है मेरी मनोकामना।
     मेरा प्राण तेरा ही नाम ले, करे मन तेरी ही उपासना।
     गुनगान तेरा ही मै करुँ, मुझे ये लगन भगवान दे।
     मैं तो कब से तेरी शरण मे हूँ।
   इन्हीं शब्दों के साथ आज के सत्संग को विराम देता हूँ।
   जय सीताराम !
– Ajey.
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