नित्य प्रत्याहार,धारणा तथा ध्यान स्थिति नोट्स

जो साधक नित्य एकत्व साधना के मार्ग पर चलने को कटिबद्ध हैं

उन्हें नित्यप्रति ध्यान अवस्था में जाने का अभ्यास करना चाहिए।
जैसा पिछले ब्लॉग पोस्ट में चर्चा कर चुके हैं,
प्रत्याहार और धारणा के बाद
ध्यान अवस्था में जाना सुगम होता है।
प्रत्याहार ( शारीरिक विषयों से वैराग्य )
के लिए चेतावनी भजन तथा विरक्ति
भक्ति रचनाओं का गायन सहायक होता  हैं।
स्नान की तैयारी करते हुए  पूज्य बाबूजी
भक्त संत कबीरदासजी, ब्रम्हानन्दजी 
और गुरु नानक के जो भजन गाते थे, उनका
महत्व और गूढ़ता अब समझ में आ रही है।
उदाहरणत:
1. अवसर बीतो जाये रे प्राणी !
2. रे मन मूरख जनम गवाओ !
3. जपो रे राम नाम सुख दायी !
4. जगत में जीवन दो दिन का !
5. जनम तेरा बातों ही बीत गयो !
6. रे मन प्रभु से प्रीत करो !
यदि हम आसक्ति से ग्रस्त हों तो
स्वामी शरणानन्दजी महाराज की
रचना याद करके निज सत्संग करें :–
” मैं नहीं मेरा नहीं, यह तन किसी का है दिया।
जो भी अपने पास है वो सब किसी का है दिया। “
यदि अभिमान की प्रचुरता हो तो 
स्वामी सत्यमित्रानन्दजी के
परामर्श पर अमल करके
विनय पत्रिका के पद गायें :–
” ताहि ते आयो सरन सवेरे।”
” यह विनती रघुवीर गोसाईं। “
 
 
धारणा के लिए ज्योति जला कर त्राटक करना उपयोगी होता है।
नाम जप कर, ” यतो यतो निश्चरति। ……… ” आदेश का पालन करके
स्वामी सत्यानन्दजी महाराज का समर्पण भजन
” बसे रहो श्रीराम ….” के साथ ध्यान अवस्था
में जाने के लिए ‘धारणा’ संपन्न कर सकते हैं।
तत्पश्चात ध्यान अवस्था में जाने के लिए  INNOVATION का मुख्य रोल है।
स्वामी अखण्डानन्दजी महाराज के ‘ भक्ति योग’ में दर्शाये मार्ग पर चल सकते हैं  ……
कलात्मक रुचि से रमणीय स्थान चुनकर मानसिक रूप से इष्ट का श्रृंगार करके अपने मन पसंद फूलों से
स्वागत करें, झूला झूलें, नौका विहार, नृत्य-संगीत फल-पकवान का, रसास्वादन करें, मन की बातें कहें।
The canvas, the mood, the agenda, schedule everything would be
as per the individual devotee’s exclusive design and unique choice.
To break the monotony, s/he can bring about variety at one’s sweet will.
It is for this reason that oft posed question is : ” What gives ‘you’ joy ? “
It is imperative for us to know the liking and taste of of the LORD, who
resides within us, so that we provide joy and make a lasting impact
through our various mental-emotional-spiritual offerings to HIM .
In the absence of this vital information, how can we make the
choicest offering to our LORD and really please HIM ?
It would also be prudent to mull over innovative stride
to offer newer creations at His Lotus Feet every day !
मेरे विचार से हमें अपने इष्ट को ध्यान अवस्था में रिझाने के लिए
किसी वाह्य साधन अथवा सामग्री की आवश्कता नहीं होती।
पूज्य अम्मा का सारगर्भित सूत्र “ भक्ति भावना से होती है
का तर्क और अर्थ अब समझ में आया।
 
 
NO  PHYSICAL  REQUIREMENT 
हमें न तो कोई सुन्दर सजा पूजा मंदिर चाहिए,
न कोई मन्त्र-स्तुति-प्रार्थना-भजन चाहिए,
न कोई स्वादिष्ट पकवान प्रसाद-फल चाहिए,
न कोई बंधु-बान्धव-मित्र का समूह चाहिए।
 
 
SPIRITUAL   COMMITMENT 
हाँ चाहिए पूर्ण समर्पण भावना,
प्रभु को पाने की तीव्र अभीप्सा,
राम कृपा-राम दर्शन की अभिलाषा,
दिव्य मातापिता सीताराम का सानिध्य
All that we need is SIMPLE pius HEART
प्रभु श्रीराम ने सुन्दर काण्ड में विभीषण से मिलने के पूर्व घोषणा की  :–
 ” निर्मल मन जन सो मोहि पावा।  मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। “
प्रभु श्रीराम ने उत्तर काण्ड में भक्ति मार्ग नगरवासियों को समझाते हुए कहा :–
सरल सुभाव न मन कुटिलाई।  जथा लाभ संतोष सदाई।।
FINALLY
 पूज्य बाबूजी ने
ऑडियो कैसेट में closing
prompt कहा है :—
मुझे राम कृपा चाहिए !
मुझे राम दर्शन चाहिए !
मुझे राम चाहिए …… 
मुझे राम चाहिए .……. 
मुझे राम चाहिए ……। 
 
ULTIMATE   RESULT
 
ध्यान अवस्था में दिव्य माता-पिता का
अपार स्नेह अविरल प्राप्त करने की
नित्य प्रति प्यास बढ़ती ही जाए तो….….
‘रह न सको बिन प्रभु तुम भी’ स्थिति होगी
समाधी बात-बात पर लगने लगेगी ……
जैसा Gospel of Ramkrishna में
ईश्वर चंद विद्यासागरजी के बारे में वर्णित है  !
श्रीहनुमान प्रसादजी पोद्दार ‘भाईजी
के शब्दों में हम  ‘ जीवनमुक्त ‘ हो जाएंगे !
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