Getting into Meditative State for DIVINE BLISS

महर्षि पतञ्जलि के अष्टांग योग का उल्लेख हमने पिछले ब्लॉग पोस्ट में किया था ।
वे हैं :  यम, नियम , आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार , धारणा, ध्यान तथा समाधी।
हम ने यह मान लिया था कि अभ्यासी साधक को प्रथम 6 अंगों की आवश्यक विस्तृत
जानकारी है तथा वे नियमित रूप से उसका अनुशासन के साथ पालन कर रहे हैं।
ज्ञान की श्रंखला टूटने न पाये इसलिए योग के अंगों का संक्षिप्त परिचय दे रहे हैं ।
 यम –   अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (Behavioural discipline )
नियम – शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान ( Self discipline)
आसन – Exercises for maintaining flexible and healthy body
प्राणायाम – Breathing exercises for stronger lungs and  inward focus
प्रत्याहार – Letting go of the attachment to senses
धारणा – Concentration
ध्यान – Meditative State
समाधी – Prolonged Divine Bliss in Meditative State.
Even at the cost of repetition, salvation (मोक्ष ), परमात्मा  (श्रीराम) और उनकी कृपा का दर्शन
तथा अपार आनन्द ( Unbound Bliss) की अनवरत प्राप्ति अभी और सदैव form the salient objectives
of life. In Management parlance , DIVINE BLISS ( आनन्द ) is the ‘VISION’ ;
and our mission is constant communion with the LORD,which Pujya Babuji
called नित्य एकत्व साधना।
एक कहावत हम सब स्कूल में सुन चुके ” हैं करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान !”
अतएव, नित्य प्रति, अन्तर्मुख होकर, ध्यान अवस्था में रहने के अभ्यास की नितान्त आवशकता है।
साधक ध्यान अवस्था प्राप्त सहजता से प्राप्त नहीं कर पाते इस कठिनाई का उल्लेख कई मार्गदर्शक
गुरुओं के प्रवचन के बाद के प्रश्नोत्तर काल में कई TV कार्यक्रमों में देखा-सुना है।
अतएव, इस विषय पर यहाँ चर्चा करना असंगत नहीं है।
Let me try the Harvard ‘case study’ methodology  to address the issue.
I had gone to the Harvard Business School(HBS) in March 2003
to do their highest professional course called the Advanced
Management Program ( AMP). As most of management graduates
and post- graduates know, Harvard is considered to be ‘Mecca’ of
Management ‘. HBS is famous for its ‘case study’ methodology
of education for imparting knowledge in the Management field.
I was a favourite student of Prof David Garvin, a leading faculty and
an authority on General Management, whose authored books are
prescribed for MBA and refresher courses for professionals, in the
the Management Institutions world over in general and Indian
Institutions in particular,
Prof. David Garvin in my personal one-to-one talk in April 2003,
shared the back-ground philosophy of the ‘case study’ approach.
He said, ” History may not repeat itself, but posing a ‘ what if ‘                                                                                       question, enables every manager to visualize and prepare if a
similar challenging situation were to be faced by him /her in future.
Taking a cue from Prof. Garvin, let me recall and consider my dialogue
with Pujya Babuji ( my Gurudev) on the subject, and revisit the dialogue,
held with Gurudev almost 20 years ago. Mind you, I had by then been into
spiritual साधना for over 30 years and was nearing 50 years of my physical life.
It was more or less a confession to Pujya Babuji ( Gurudev) :—
मैं : ” ब्रह्म मुहूर्त में ध्यान लगाने की कोशिश करता हूँ, पर ध्यान नहीं लगता  !”
बाबूजी :  ” ये वह साधक ही कह सकता है, जो प्रयास करता है ! “
उन्होंने फिर पूछा : ” क्या होता है ? “
मैने कहा : ” आँख बंद करते ही ऐसा लगता है,  जैसे विचारों का ट्रैफिक खुल गया हो। “
बाबूजी : ” फिर क्या होता है ? “
मैं : ” ऐसी विचारों की ‘आंधी’ चलती है ; लगता है  bombardment’ हो रहा है । “
बाबूजी : ” तो फिर क्या करते हो ? “
मैं : ” अभ्यास-वैराग्य से मन को वश में करने की कई बार कोशिश की पर, असफलता हाथ लगी “
बाबूजी : ” अन्त में क्या हुआ ? “
मैं : ” आँख खोलनी पड़ी, आसन छोड़ कर उठना पड़ा ! “
बाबूजी : ” ऐसा कितनी बार हुआ ?  कुछ हट कर different भी हुआ ? “
मैं : ” दर्जनों बार ; एक दो बार तो mentally इतना थक गया कि पूजा कमरे में ही सो गया ! “
Babuji assured me that several other devotees have had similar experience.
He advised me not to get dis-heartened. He said ” बेटा ! ध्यान किया नहीं जाता, होता है ! “
He asserted, “We do not meditate ; in fact, we get into meditative state ! “
He went on to explain as to how the problem of ” thoughts traffic ” could be addressed.
The FIRST effective method had been advocated by Sri Aurobindo. He had asserted
that one must close the door forcefully on the face of intruding thoughts. This is akin to
‘mind fullness’ style propagated by Lord Buddha, Swami Yoganandaji and ‘hath yogis’.
However, Pujya Babuji pointed out that this requires strong will power.
The SECOND effective method was advised by Mother of Shri Auobindo Ashram.
She asserted that the thoughts behave like monkeys, which keep on jumping until
the extra energy ( that they seem to possess ). After some time, the monkeys  lose
their jumping tendency, and the mind coolly gets back to normal behaviour.
This style is followed by Brahmkumari’s and many ashrams of Mathura-Brindavan.
But Pujya Babuji pointed out that this requires lot of patience.
The THIRD effective method was suggested by Swami Sivanand ji . He introduced
the concept of meditation time to be akin to ” appointment ” with the Supreme LORD.
The “thought ” were to be told to “register” themselves as guests, to whom we will
get back immediately after meeting the Supreme LORD himself, the King of KINGS.
This enables one to achieve what Yogis call विचार शून्य स्थिति (Thoughtless state)। 
The last method seems to be a practical solution for professionals and office goers.
In this process of emptying out the mind, the entire laundry list gets of thoughts,
occupying the mind gets prepared and upon prioritizing and clubbing / refinement,
one gets a well structured  “To do” list for the day, week, month, season or year.
Going by one’s attitudinal assessment and the situation, one can make a choice.
 Pujya Babuji informed me that Swami Santananda ji followed this methodology and
as per her Guru’s candid advice, she developed a practice of always keeping a diary
and pen at an arm’s length even at her bed side to jot down ‘inspirational ideas’
whether stray thoughts or problem solutions or composing poems.
For emptying out the mind after practising प्रत्याहार / धारणा ,
one can read a book or listen to discourse of one’s Guru
or Ideal. Some people listen to instrumental music or  भजन।
I feel blessed because Pujya Babuji (My Guru ) gave me an
audio tape with ‘prompts’ recorded in his own voice, which I
listen to in the early hours to get into the Meditative state.
Beyond the meditative state as one is into  विचार शून्य स्थिति 
and the canvas is absolutely clean, one can paint the picture
of one’s Divine Father/ Master / Beloved / Parents / Friend as
per one’s chosen “Path” and with location as per one’s own
state of health and back-ground and sit-sing-dance-talk or
communicate as per on’s own sweet will and tune, in one’s
own thoughts,words or feelings with absolutely no guidance,
rules or restrictions. After all it is an occasion for communion
of the आनन्द के लिए छटपटा रही आत्मा with सच्चिदानन्द परमात्मा।
At this stage as time. place and manner lose significance,
Yogis are known to have experienced DIVINE BLISS and
have gone into Samadhi several times and for many hours.
Lest we should get entangled in the web of joy & sorrow,
poet HW Longfellow has given a definitive direction in his
immortal poem ‘ The Psalm Of Life’ :—
Not enjoyment and not sorrow
Is our destined end or way,
But to act that each tomorrow
Finds us farther than today !
यदि कोई हमसे पूछे कि ख़ुशी-आनन्द पाने के क्या तरीके हैं ?
तो मैं उन्हें पूज्य गुरुदेव के छाया-माया दृष्टांत को सुनना चाहूँगा।
हमारे शुभ विवाह को कुछ ही महीने हुए थे।  एक रविवार को सत्संग के समय
अमिता  और मुझ से quizzing करते हुए बोले, ” कोई एक है जो मेरे साथ हर दम
रहती है, मेरा साथ ही नहीं छोड़ती, बताओ क्या है ?
हम लोग सोच रहे थे कि बाबूजी ने आगे कहा ” हर समय साथ चलती है, साईकिल
पर चलूँ या दौडूँ, मुझ से चिपके ही रहती है। हाँ दिन में 12 बजे कुछ क्षण को साथ
छोड़ती है, पर फिर साथ लग जाती है।
अमिता ने तपाक से कहा ” अरे परछाई है ! “
बाबूजी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ” शाबाश ! अपनी ‘छाया’ की तरह प्रभु की ‘माया’
का भी यही हाल है।  वह हमारा साथ नहीं छोड़ती ! केवल जब प्रभु की कृपा सिर पर होती है
या जब साष्टांग प्रणाम करते हुए ( पूर्ण समर्पण भाव में होते हैं ) तब माया लुप्त होती है ! “
मैने वार्तालाप में भाग लेते हुए निवेदन किया कि एक स्थिति और है……..… जब  हम
घर के अन्दर चले जाते हैं तब ‘छाया’ ग़ायब हो जाती है !……….
बाबूजी बोले, ” बिलकुल ठीक ! इसीलिए जब हम अन्तर्मुख होते हैं, प्रभु का आश्रय लेते हैं,
तब माया साथ छोड़ देती है। “
उपरोक्त दृष्टांत से यह समझ में आया कि………
AA .  हमें सुख-ख़ुशी तब मिलती है, जब हम प्रभु कृपा से
1. कर्तव्य कर्म करते हुए, चुनौतियों का सामना करके सफलता हासिल करते हैं , (स्वकर्म में उत्कर्षता )
2. दीन-दुखी-दरिद्र , रोगी, अक्षम बालक, महिला,वृद्ध की सेवा करते  हैं , ( परिवार तथा समाज सेवा )
3. अनुशासित रह कर अध्ययन करके ज्ञान, क्षमता और सकारात्मक प्रवृति बढ़ाते हैं । (ASK triangle )
BB. हमें शान्ति-ख़ुशी तब मिलती है, जब हम प्रभु प्रेरणा से
1. सात्विक आहार और नियमित व्यायाम से शरीर स्वस्थ निरोगी रखते हैं ,  ( स्वास्थ्य )
2. प्राप्त सम्पदा और वैभव को प्रभु प्रसाद मानकर संतोष मय जीवन निर्वाह करते हैं  (संतोष )
3. इच्छाएं कम करके , सहनशील और संयम में रहकर, स्वावलम्बी बनते हैं । ( संयम-नियम )
CC. हमें  अपार आनन्द नित्य तब प्राप्त होता है, जब हम गुरु की आज्ञा-प्रोत्साहन पर
1. सात्विक विचार वचन और व्यवहारसे उठकर दैविक स्वभाव बनाते हैं , (स्वभाव )
2. निज सत्संग द्वारा छिद्रान्वेषण करके निरंतर प्रगति करने का प्रयास हैं , (निज सत्संग )
3. ध्यान अवस्था में रहने का नियमित रूप से  अभ्यास करते हैं । (ध्यान अभ्यास )
DD. हमें  अपार आनन्द निरंतर  तब प्राप्त होता है, जब हम गुरु के मार्गदर्शन से, अन्तर्मुख हो कर
1.  समर्पण भाव से ‘योग’ करते हुए  प्रत्येक विचार, वचन, कार्य ,क्रिया
     तथा फल को प्रभु के साथ जोड़ कर नित्य एकत्व साधना करते हैं, (नित्य एकत्व )
2.  प्रत्येक घटना में  समता भाव से प्रभु कृपा का दर्शन करते हैं , और ( कृपा दर्शन )
3.  कुछ भी न चाहते हुए ,सहज स्नेह से नाम कमाई करते है  !   ( नाम कमाई )
इन ज्ञान सूत्रों को आचरण में लाना गृहस्थ संत के लिए नितांत आवश्यक है।
ये मौलिक सिद्धांत निरंतर स्मरण रहे और इनसे प्रेरणा मिलती रहे,
इस उद्देश्य से पूज्य बाबूजी ने गोस्वामी तुलसीदासजी की विनय पत्रिका
से निम्नलिखित पद  फ्रेम करवा कर अपने पूजा मंदिर में रखा था :—
कबहुँ कहों यह रहनी रहौंगो ,
श्रीरघुनाथ कृपाल कृपा ते संत स्वाभाव गहोंगो।
जथा लाभ संतोस सदा, काहूसों कछु न चाहौंगो।
परहित निरत, निरंतर मन क्रम, वचन नेम निबहोंगो।।
परुख वचन, अति दुसह श्रवण सुनी, तेहि पावक न  जारोंगो।
विगत मान सम, सीतल मन, पर गुन नहीं दोस कहोंगो।।
परहरि देह जनित चिंता, दुःख-सुख सम बुद्धि सहोंगो।
तुलसीदास प्रभु यह पथ रही अविचल हरी भगति लहौंगो।।
कबहुँ कहों यह रहनी रहौंगो ,
श्रीरघुनाथ कृपाल कृपा ते संत स्वाभाव गहोंगो।
जथा लाभ संतोस सदा, काहूसों कछु न चाहौंगो।
परहित निरत, निरंतर मन क्रम, वचन नेम निबहोंगो।।
परुख वचन, अति दुसह श्रवण सुनी, तेहि पावक न  जारोंगो।
विगत मान सम, सीतल मन, पर गुन नहीं दोस कहोंगो।।
परहरि देह जनित चिंता, दुःख-सुख सम बुद्धि सहोंगो।
तुलसीदास प्रभु यह पथ रही अविचल हरी भगति लहौंगो।।
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5 thoughts on “Getting into Meditative State for DIVINE BLISS

  1. Some corrections and additions were deemed necessary in the two earlier blog posts published under the same heading last night and this morning.
    Would request you to please ignore / delete them.
    I am sorry for the inconvenience caused to you.

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  2. Very very informative article. Lot to learn from it.Full of values that needs to be followed in everyone’s life

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  3. This post gives clear picture of, how a learner of meditation should proceed. The different methods can be tried & the suitable one can be followed.
    The छाया माया example explains the goal of a sadhak, which is नित्य एकत्व with the Lord. How can one try & get into that state is also beautifully explained.

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