Preparations for Dhyan – The Meditative State

पूज्य बाबूजी (गुरुदेव) ने बताया था, “ ध्यान किया नहीं जाता, वह तो होता है !”

As such, one has to remember that we do not perform meditation ;
we, in fact,  get into the meditative state. ध्यान कर्म नहीं है, वह तो एक क्रिया है.
We can well appreciate Pujya Babuji’s logic for the first prompt in the
audio cassette on MEDITATION. He says with utmost seriousness :–
                                   ” अन्तर्मुख हो जाओ ! “
However, permit me to submit that we have to make certain prior
preparations, which are conducive to getting into meditative state.
क्योकि पूज्य बाबूजी अनेक दशकों से ध्यान अवस्था में रहते थे, अतः स्थान-समय-वातावरण
आसन आदि पहले से नियत होते थे। …….   और मुझे उनके साथ ध्यान करने का जब-जब
सौभाग्य प्राप्त हुआ तब वे ध्यान की तैयारी पहले ही कर चुके होते थे ………….………
मैंने यदा-कदा ही इन बारीकियों पर उनसे चर्चा की होगी, अब स्मरण नहीं है पर
उनसे प्राप्त कुछ पुस्तिकाओं के पढ़ने पर Everything fell in place.
Let me try to recapitulate and collate those learnings and tips.
ज्ञानी योगियों ने, विचारकों ने, अनुभव कर्ताओं ने, मनीषियों ने जो बातें लिखी हैं
या अपने प्रवचनों के माध्यम से बताई हैं, उनके अनुसार, आधुनिक युग में
जो तैयारियाँ व्यवहारिक हैं और जानने योग्य है, वे निम्न लिखित हैं :——
स्थान – शोर-गुल से दूर, एकान्त – जहाँ वाहन आवागमन के हॉर्न,
टेलीफोन इत्यादि की ध्वनि, जानवर-जीव-जंतु की आवाज़ का विघ्न न हो ,
 Secluded, quiet place with no external communication.
वातावरण – ना बहुत गरम ; ना बहुत ठंडा ; आँधी – बारिश रहित मंद वायु ;
Cool pleasant environment devoid of filthy odour.
Avoid closed area, which is stuffy and lacks in fresh air.
आसन – ऐसा हो जिस पर सुख पूर्वक बैठ सकें, यदि ज़मीन पर बैठ रहे हैं
तो स्थान को साफ़ करके चटाई, आसनी, yoga mat , रूई की गद्दी
अथवा कम्बल पर सूती बेड कवर या चादर बिछाना उपयुक्त होगा।
Clean place, properly swept is desirable. It is a taboo
to sit on the ground or floor as it will drain the positive
Posture – Should be such that the back bone can remain
erect and there is no pain in the muscles or joints.
Although पद्म आसन , सुख आसन, वज्र आसन are considered
ideal, however, there is no hard and fast rule.
What is important is that one should be able
to sit comfortably relaxed for long duration.
Moreover, use of chair is not a taboo.
Some Yogis including Sri Aurobindo are known
to have used armed chair while sitting for meditation.
समय – अभ्यास के लिए ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से दो घंटे पूर्व), और
संध्या ( गौधूलि बाद) और रात्रि की वेला को उपयुक्त माना गया है।
शरीर शौच-लघुशंका से निवृत होकर दाँत-मुँह-गला , नाक-आँख
साफ़ करके कुल्ला करके बैठने की सलाह गुरुजनों ने दी है। वाह्य स्वछता स्नान से
मिलती है, पर  स्नान करना अनिवार्य नहीं है, स्नान उपरान्त स्फूर्ति बनी रहती है ;
तथा आलस्य दूर रहता है। आतंरिक शुद्धता स्नान से नहीं, नाम जप से मिलती है
In the last century, several enlightened souls could meditate
effortlessly any where and at any point of time.
The statement is relevant for many सिद्ध गुरु of this century.
बाबूजी का  quotable quote था “ जिससे प्रेम होता है, उसकी बार-बार याद आती है।  
जिसको बार-बार याद करते हैं उससे प्रेम हो जाता है ! “
उनको पाने की अभीप्सा इतनी बढ़ जाये कि जैसा पिछले ब्लॉग पोस्ट में
पारम्परिक चेतावनी को सन्दर्भ सहित याद किया था :
” रे मन प्रभु से प्रीत करो , प्रभु की प्रेम-भक्ति-श्रद्धा से अपना आप भरो !”
” ऐसी प्रीति करो तुम प्रभु से प्रभु तुम माहि समाऍ,
 ” बने आरती-पूजा जीवन, रसना हरिगुन गाये,
” रामनाम आधार लिए तुम इस जग में बिचरो,
रह न सको बिन प्रभु के तुम भी ऐसा ध्यान धरो !”
जो भक्त ” नित्य एकत्व ” साधना में संलग्न होते हैं,
वे सच्चिदानन्द परमात्मा के साथ ‘योग’ करते हुए,
सतत अर्थात प्रत्येक क्षण ‘ध्यान’ अवस्था में रहते हैं  !
यहाँ एक साधारण पर महत्वपूर्ण बात जान लें कि  ‘योग’
शब्द संस्कृत भाषा की ‘यजु’ धातु ( verb ) से बना है,
उसका शाब्दिक अर्थ है ‘ जोड़ना ‘। सरल भाषा में
यदि समझना हो तो ” योग तब होता है ………… 
जब हम मन-वचन-कर्म या आचार, विचार, क्रिया 
एवं फल को सच्चिदानन्द परमात्मा से जोड़ते हैं ! “
महर्षि पतञ्जलि ने योग के 8 अंग बताये हैं :–
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधी
यहाँ यह माना जा रहा है कि यम-नियम  आदि योग के अंग के प्रथम
6 अंगों के बारे में विस्तृत जानकारी अभ्यास कर्ता ने हासिल कर ली है।
और वह उनको आचार-विचार-व्यवहार में ला रहा है।
Let us discuss in detail the ATTITUDINAL aspect of Meditational State
and the “corner stone” YOGA with its significance for नित्य एकत्व  साधना .
भले ही आधुनिक युग में ” योगा ” शब्द बहुत सुना जा रहा हो पर
साधक भक्त जानते हैं कि प्रत्येक व्यायाम को योगाभ्यास नहीं कह सकते।
भक्त / संत कैसे अपना प्रत्येक कार्य ‘योग’ के साथ कर सकते है अथवा करते  हैं ,
इसका प्रमाण संत कबीरदासजी को संत जेना बाई से हुई भेंट में मिला था।
स्वामी अखण्डानन्दजी के शिष्य स्वामी गिरीशानन्दजी ने रेनुकूट में श्रीमदभागवत पुराण पर
प्रवचन करते हुए महाराष्ट्र की संत जेना बाई की संत कबीरदास से हुई भेट का वृतांत सुनाया था।
कबीरदासजी ने जेना बाई की साधना प्रसिद्धि सुनकर उन के साथ सत्संग करने का तीर्थ यात्रा का
कार्यक्रम बनाया।  जब वे जेना बाई के गॉव पहुँचे तो जेना बाई का पता पूछा। उनके निवास के पास
पहुंचकर, उनकी पहचान पूछी तो एक सज्जन ने कहा ” उधर घर के सामने जो दो महिला खड़ी हैं,
उनमे एक जेना बाई है ! “
संत कबीरदासजी जब उन महिलाओं के पास पहुंचे तो दोनों में ऊपले ( कंडों ) के कारण वाकयुद्ध
चल रहा था। दोनों किन्ही उपलों को अपना बता रहीं थी।  लगभग 10 मिनिट तक वाक्द्वंद सुनकर
कबीरदासजी को जेना बाई की पहचान मिल गयी और वे मध्यस्तता करने के उद्देश्य से अपना परिचय
देने लगे।  जेना बाई ने कबीरदासजी को यह कह कर टोक दिया ” कबीरदास ज़रा धैर्य रखो, मुझे बात
करके समस्या सुलझाने दो ! ” कबीरदासजी ने मन ही मन सोचा ” कहाँ आगये ? किसी ने ग़लत ही
इनको पहुंची हुई महिला संत बता दिया, ये तो साधारण से ऊपले पर झगड़ा कर रहीं हैं ! “
जब 10 मिनिट और देखने के बाद कबीरदासजी से नहीं रहा गया तो बोले ” मैया ! गोबर के उपले
तो एक जैसे ही नज़र आते हैं ; कोनसा किसका है ये पहचान नहीं हो सकती ! ” संत जेना बाई बोली,
” कबीरदास मैंने तो सुना था की तुम बहुत ज्ञानी भक्त कवि हो, पर तुम तो उलटे ही निकले !
कबीरदास दो -दो करके उपले उठाओ और कान पर लगाओ। ” जब कबीरदासजी में कान पर उपले
लगाये तो कुछ से ‘ विट्ठल-विट्ठल ‘ की ध्वनि सुनाई दी।  वे आश्चर्य चकित रह गए।  संत जेना बाई
ने कहा ” कबीरदास जिन उपलों से ध्वनि आ रही हो उन्हें अलग रखते जाओ वे मेरे हैं ! अरे मैं कोई
उपले थोड़ी बनती हूँ ; मैं तो ‘विट्ठल-विट्ठल’   का कीर्तन करती हूँ ; वो तो ताली बजाते में गोबर
हाथों के बीच आ जाता है इसलि ए उपले बन जाते हैं ! मुझे विट्ठल देव का प्रसाद बनाने के लिए
उपले चाहिए होते हैं।  मैं प्रसाद उन्हीं उपले से बना सकती हूँ जिनसे विट्ठल नाम धुन निकलती हो,
इसीलिये मैं पड़ोसन से अपने उपले देने को कह रही थी। कबीरदासजी को संत जेना बाई की महानता
और प्रभु प्रेम की लौ का परिचय प्राप्त हुआ तथा काशी से चलकर महाराष्ट्र आना सार्थक सिद्ध हुआ।

प्रातः स्मरणीय पूज्य अम्मा ध्यान की प्रक्रिया को नित्य एकत्व साधना की महत्वपूर्ण कड़ी जानती थीं।

उनका प्रिय भजन था :– भगवन तुम्हारे ध्यान में आठों प्रहार रहा करूँ  !

पूज्य अम्मा गृहस्थ किसान भक्त की एक कथा सुनती थीं …………

ऐसा माना जाता हैं कि देवर्षि नारद हाथ में वीणा लिए ” नारायण नारायण ” कहते हुए
देवलोक और मृत्यलोक में विचरते रहते हैं और उनके पास ख़बरों का अपार भंडार रहता है।
एक बार नारदजी को लगा कि कलियुग (वर्तमान समय में ) उनसे बड़ा कोई भी भक्त नहीं है ,
अतः इस विचार को प्रामाणिक बनाने के उद्देश्य से वे विष्णु लोक में भगवान नारायण के पास पहुंचे।
अन्तर्यामी प्रभु और लक्ष्मी मैया को नारदजी के मन में अभिमान अंकुरित होने का संकेत पहले ही
मिल गया था। जब नारदजी ने अभिमान सहित भगवान से सबसे बड़ा भक्त जानने की जिज्ञासा व्यक्त
की तो भगवान ने उनको भारत के एक किसान का नाम बताया।  नारदजी को बड़ा विस्मय हुआ और
स्वाभाव अनुसार वे किसान की दिनचर्या का अनुसंधान करने उसके घर पहुंचे।  नारदजी ने देखा कि
सुबह उठने पर, किसान ने धरती को प्रणाम करके अपने माता-पिता को प्रणाम करके ” राम-राम “
कहा और शौचादि से निवृत हो देव स्थान में प्रणाम करते हुए ” राम-राम ” कह कर खेत में काम
करने गया।  शाम को खेत से लौटने पर पुनः देव स्थान में प्रणाम करके “राम-राम ” कहा और फिर
माता-पिता को प्रणाम करते हुए ” राम-राम ” कहा।  रात को खाना खाकर ” राम-राम ” कह कर
चारपाई पर लेटते ही सो गया। दुसरे दिन फिर वही दिनचर्या देख कर नारदजी को आश्चर्य हुआ
और वे शीघ्रता से विष्णुलोक वापिस पहुंचे।
इसके पहले कि नारदजी कुछ कह पाते, लक्ष्मीजी ने तेल से भरा एक कटोरा दिया और कहा,
” नारद ! मैं तुम्हे ही याद कर रही थी।  मुझे प्रभु के प्रिय भक्त से एक अनुष्ठान करवाना है
……………… .……………. इस कटोरे को लेकर ब्रह्माण्ड के तुरन्त 7 चक्कर लगा कर
वापिस आओ पर पूरी सावधानी रखना, जिससे कटोरे से तेल की एक बूँद भी गिरने न पाये।
नारदजी ” जो आज्ञा ! ” कह कर निकले और शीघ्रता से कार्य संपन्न करके लक्ष्मी मैया के समक्ष पहुंचे।
उन्होंने कहा, ” मैया ! आपका अनुष्ठान बिना विघ्न के संपन्न हो गया, तेल की एक भी बूँद नहीं गिरी। “
लक्ष्मी मैया ने जैसे ही उन्हें धन्यवाद दिया, प्रभु ने पूछा ” क्या  किसान से मिले ?
उसे काम करते देखा था ? “नारदजी ने बताया कि उन्होंने किसान को दूर से देखा था,
पर व्यंग-रोष की मिश्रित भाषा में नारदजी बोले ” भगवान आप भी मज़ाक करते हैं !
दिन भर में 5 बार “राम-राम “कहने वाले को अपना सबसे बड़ा भक्त कह रहे हैं ?
जब कि मैं लाखों बार आपका नाम जपते हुए सारे लोकों में भ्रमण करता हूँ ! “
प्रभु ने कहा, ” नारद ! हल जोतते, बीज बोते, सिचाई करते, अनाज काटते हुए ,खेती और
पारिवारिक काम करते हुए वह  मेरा स्मरण तो करता ही है, अपने परिवार और देश की
जनता के लिए शक्ति-वर्धक अनाज से सुन्दर स्वस्थ की निरंतर मंगल कामना करता है। “
इस बार मैया की बारी थी, उन्होने पूछा, ” नारद अभी जब अनुष्ठान करते समय ब्रह्माण्ड के
तुमने 7 चक्कर लगाये थे, तब तुमने कितनी बा में र प्रभु का नाम लिया था ? ”  नारदजी मौन थे।
मैया ने कहा ” नारद ! गृहस्थ जीवन की ज़िम्मेदारी के साथ, समर्पण भाव से शुभ संकल्प और
कर्तव्य परायण हो कर परिवार की सेवा करना और प्रभु के स्मरण का दिखावा नहीं करना,
बहुत कठिन तपस्या है। नारदजी को ग़लती का अहसास हुआ और उनका अभिमान चूर हो गया।
मेरा निवेदन है एक बार ब्लॉग पोस्ट ” नित्य एकत्व साधना “ का पुनरावलोकन करें जिसमें
श्री श्री आनंदमयी माँ ने बाबूजी को नित्य एकत्व साधना के लिए गृहणी माँ और शिशु का
उदाहरण दिया था।
We may notice the role reversal, if we go through Ramcharit Manas.
रामचरित मानस के अरण्य काण्ड में जब नारदजी ने प्रभु श्रीराम से पूछा था :—
      ” जब विवाह मैं चाहन कीन्हा, प्रभु केहि कारण करे न दीन्हा ? “
तब श्रीराम ने अपनी ज़िम्मेदारी उजागर करते हुए कहा था : —-
      ” सुन मुनि तोही कहहुँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।
        करहुँ सदा तिन्ह कै रखवारी।  जिमि बालकहीं राखी महतारी।।
यदि श्रीमद्भगवत गीता के बारहवें अध्याय के 4 श्लोकों ( 8 से 11 ) का अध्यन करें तो
नित्य एकत्व साधना के लिए पूर्ण दिशा निर्देश मिल जाते हैं।  एक बार 12 / 8 श्लोक को पढ़ें  :–
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।
श्रीहरि गीता के 12 / 8 से 11 छंद निम्न लिखित हैं  :—
मुझमें लगाले मन, मुझी में बुद्धि को रख सब कहीं। मुझमें मिलेगा फिर तभी इसमें कभी संशय नहीं।।
मुझमें धनंजय ! जो न ठीक प्रकार मन पाओ बसा। अभ्यास-योग प्रयत्न से मेरी लगालो लालसा।।
अभ्यास भी होता नहीं तो कर्म कर मेरे लिये।  सब सिद्धि होगी कर्म भी मेरे लिए अर्जुन ! किये।।
यह भी न हो तब आसरा मेरा लिये कर योग ही।  कर चित्त-संयम कर्म-फल के त्याग सारे भोग ही।।
With the aforesaid physical and mental preparedness, we are ready to step
into the Meditative state. ध्यान हो सके इस प्रक्रिया को initiate गुरुदेव करते हैं !
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