Fundamental questions : What gives you joy ? अपने लिए क्या किया? साधना के लिए क्या करना चाहिए ?

In the last post, we referred to the ‘check formula’ developed by Pujya Babuji to ascertain the Vital & Essential items after initial discussions at Sri Aurobindo Ashram, New Delhi in the room of Pujya Chachaji Shri Surendra Nath Jauhar ‘Faquir’ :–
” Can I NOT do without this ? ”
We may conclude that CONTENTMENT ( संतोष ) is the key to the peace of mind.

While on the road to spiritual progress, the logical  question is to ascertain whether there is any key to joy.
As such, it is a good idea to ask people around :-
” What gives you joy ?”
The spontaneous reply is acquisition or possession of some non-living item( वस्तु ), becoming close to some living being (व्यक्ति-प्राणी ) or attaining a condition ( परिस्थिति-वातावरण-स्तर ).

एक प्राचीन कथा, जो बाबूजी सुनाते थे, का पुनरावलोकन करें ?
एक गाँव की सीमा पर एक आश्रम -मंदिर था जहाँ 11 सन्यासी साधुओं की टोली रहती थी।
वे लोग सुबह आश्रम में स्वाध्याय करते, दुपहर में सब्ज़ी-भाजी के खेत में काम करते थे और शाम को मंदिर में भजन-कीर्तन करते थे, जिसमें गाँव के निवासी भी शामिल होते थे। आरती पश्चात इलायची दाने का प्रसाद वितरण के बाद मंदिर का पट बंद होने साथ गतिविधियाँ संपन्न होने पर वे आश्रम में रात्रि विश्राम करते थे । वे सन्यासी स्वावलम्बी रह कर पूजा-पाठ की दिनचर्या से बहुत प्रसन्न थे।

पास के शहर के रईस को इन सन्यासी साधुओं की टोली की प्रसन्नता से ईर्ष्या हुई, तो उसने उनको काम की चिन्ता से ग्रस्त करने के लिए, एक रात को उनके आश्रम के आहते में 11 गायें छोड़ दीं। दूसरे दिन जब सन्यासी साधुगण उठे और स्वाध्याय के लिए तैयार होने लगे, तो उन्होंने आश्रम आहते में गायों को देखा। सन्यासी साधू इस अप्रत्याशित घटना से बहुत उत्साहित थे। कोई दूध प्राप्त होने की बात कह रहा था तो कोई कंडे थाप कर भोजन पकाने के लिए ईधन मिलने की बात पर हर्षित हो रहा था। कोई उनके लिए चारा जुटाने की समस्या तो कोई गायों को रस्सी से बाँध कर रखने का सुझाव दे रहा था,  जिससे खेत बचे रह सकें।
साधुओं के मुखिया ने कहा ” भगवान ने भजन-पूजन की उबाऊ दिनचर्या से हट कर गौ सेवा का सुअवसर दिया है !” गायों के आने से सन्यासी-साधू ना तो अप्रसन्न हुए और ना ही चिंतित।
सन्यासी-साधुओं ने अपनी-अपनी ड्यूटियां बाँट ली। कुछ सन्यासी गौशाला बनाने में जुट गए तो कुछ गोबर साफ़ करने मैं। दो सन्यासी गायों को नदी किनारे लेजा कर उन्हें स्नान करा कर ले आये। दो सन्यासी-साधु घास-चारे का इंतज़ाम करने लगे तो दो सन्यासी गाय दुहने की तैयारी में जुट गए। 2-4 दिन में व्यवस्था सुचारू रूप से चलने लगी। अपनी टोली के दूध-दही-पनीर-मक्खन की आवश्यकता के बाद भी दूध की अधिक मात्रा देख, सन्यासी-साधू शाम की आरती के बाद प्रसाद में पेड़े बाँटने लगे जब इसके बाद भी दूध बचा तो खीर का प्रसाद भी वितरित किया जाने लगा। आस-पास के गाँव से भी भक्त अधिक संख्या में आकर भजन-कीर्तन में भाग लेने लगे। सन्यासी साधु आश्रम गेट पर छाछ घड़े में रखने लगे, जिससे प्रत्येक आगंतुक को दिन में आगमन पर छाछ से स्वागत किया जाने लगा।
गौ सेवा के श्रम और शुद्ध दूध-दही-छाछ-पनीर-घी के सेवन से साधुओं की सेहत बेहतर हो गयी। उन्हें गौ सेवा कर एक ओर जहाँ प्रसन्नता मिल रही थी वहीँ दुसरो ओर स्वादिष्ट पेड़े-खीर प्रसाद तथा स्वागत छाछ से उनकी प्रसिद्धी बढ़ गयी। हर कोई उनकी बढ़ाई करता और साधना की सराहना करता था।
इस यशोगान की गूँज शहर में सुनकर रईस को लगा कि उसने साधुओं को 11 गायें देकर भूल की।
एक रात को रईस आश्रम में आया और अँधेरे का लाभ लेकर गायों को वापिस शहर ले गाया।
अगले दिन जब एक साधु जल्दी उठा तो उसने शोर मचाया, “गायें ‘गऊ शाला’ में नहीं है ! ”
एक सन्यासी बोला, “अच्छा हुआ अब गोबर से हाथ गन्दा नहीं करना पड़ेगा। ” दूसरा सन्यासी बोला, ” अच्छा हुआ, मुझे आये दिन दूध दुहते में दुलत्ती खानी पड़ती थी, अब नहीं पड़ेगी। ”
मुखिया ने सब सुनकर कहा, ” चलो अच्छा हुआ, हम सन्यासी लोग आध्यात्मिक कर्तव्य भूल कर गायों में अपना समय व्यतीत कर रहे थे, अब फिर से सही प्राथमिकताओं में अपना ध्यान केंद्रित कर सकेंगे। ”
गायों के चले जाने से सन्यासी-साधू ना तो अप्रसन्न हुए और ना ही चिंतित।
इस कथा से ये  शिक्षा मिलती है कि प्रसन्नता किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति पर निर्भर नहीं  करती  और न ही उसकी प्राप्ति या उसके खोने में निहित नहीं है। प्रसन्नता मन की प्रवृत्ति पर निर्भर करती है और इसी तरह चिंता मन के सोच पर निर्भर करती है।

वृन्दावन के संत श्री स्वामी अखंडानन्दजी से यदि वेदान्त ज्ञान पर कोई चर्चा करना चाहता था,

तो वे उसे स्वामी शरणनन्दजी के पास भेजते थे। श्री स्वामी शरणानन्दजी ज्ञानचक्षु युक्त सूरदास संत थे।
उनकी ज्ञान-भक्ति युक्त शैली, भाषा और संत वचन अतुलनीय थे।
स्वामी शरणानन्दजी द्वारा साधकों को दिया मार्ग दर्शन आज अनायास याद आ रहा है।

महाराजा जीवजीराव सिन्धिया का देहावसान 45 वर्ष की अल्प आयु में July 1961 में हो गया था।
राजमाता विजयाराजे सिन्धिया इस बात से दुखी रहती थीं कि महाराज इष्ट देवता की जो पूजा करते थे, वह महाराज के स्वर्गवास के कारण abruptly बंद हो गई। स्वामीजी ने राजमाता का मार्ग दर्शन करते हुए कहा कि जो पूजा महाराज करते थे, उसका दायित्व उनके जाने के बाद राजमाता पर था।

हमारी अम्मा ने एक बार स्वामीजी से कहा, ” स्वमीजी ! परिवार की गृहस्थी चलाते हुए भगवान का ध्यान एकाग्र होकर नहीं कर पाती। किसी दिन दाल जलने या किसी के टिफिन छोड़ जाने की आशंका लगी रहती है। ”
स्वामीजी ने मार्ग दर्शन देते हुए कहा, ” तुम तो प्रति दिन इष्ट का भोग लगाती हो ! जब तुम्हारा ये ध्यान रहता है कि भोग प्रसाद में त्रुटि न हो, तो वह वास्तविक पूजा होती है। जब तुम्हारी भावना रहती है कि परिवार में सब कोई इष्ट ने तुम्हे सेवा के लिए भेजे है और तुम उनको कष्ट न हो ऐसा प्रयास करती हो तो तुम भक्तियुक्त कर्मयोग करती हो ! तुम्हारी साधना पूजा मन्दिर में किये ध्यान से कहीं ऊंची है। ”

( पूज्य राम अवतार ताऊजी 1969 में लोकसभा से संसद सदस्य होने के नाते Public Accounts Committee (PAC) के मेंबर थे और जबलपुर में रक्षा प्रतिष्ठानो Gun Carriage Factory(GCF), Central Ordirnance Depot (COD), के निरिक्षण के लिए आये थे। ट्रैन लेट होने कारण वे कुछ और घंटों के लिए अपने घर पर शाम को रुक गए)। क्यों कि पूज्य अम्मा, ताऊजी से परदा करती थीं, तो पूज्य बाबूजी के संध्या ध्यान के लिए चले जाने पर परदे की मर्यादा का आदर करते हुए यद्यपि आँगन में पूज्य अम्मा बैठीं थीं, ताऊजी ने अपने मन की बातें मुझसे ही कही। शब्द तो अब पूर्णतः स्मरण नहीं हैं पर उनका सार मस्तिष्क पटल पर आज भी अंकित है।
उन्होने कहा कि, ” भैया शिवदयालजी तो भक्ति की परीक्षा में अव्वल स्थान पर हैं। इन्ही के कारण ग्वालियर में धर्म गुरु आते रहे है और हम लोगों को सत्संग लाभ मिलता रहा है। ”
हमारे पूर्वजो , पूज्य पड़बाबा, पड़दादी, बाबा, डॉ. बाबा से सम्बंधित घटनाओ का उल्लेख करते रहे।
तभी उन्होने स्वामी शरणानन्दजी से प्राप्त मार्ग दर्शन का personal वृतान्त मुझे सुनाया। ……

एक बार स्वामी शरणानन्दजी के ग्वालियर प्रवास में रामावतार ताऊजी ने उनका प्रवचन अपने निजी घर ( ‘अशोक भवन’,दाल बाज़ार,लश्कर ) में आयोजित किया था। वे स्वामीजी को अपनी कार से उतरने के बाद हाथ पकड़ कर घर के ऊपर वाले हॉल में ले जाते हुए, स्वामीजी को बताते जा रहे थे। महाराजजी ………… यह बैठक है, इसी में गद्दी पर मुनीमजी बैठते है.…… ये अंदर की बैठक है, यहाँ पारिवारिक मित्रो के साथ चाय-नाश्ता होता है। ……… अब तीन सीढ़ियों को चढ़ कर हम गैलरी में आ गए है………..…सामने बेटे-बहू का कमरा है ……… उससे लगा गेस्ट रूम, फिर मेरा कमरा, फिर पूजा रूम, रसोई घर और उसके बाद और कमरे बना रखे है, जो हमारी बहनों के आने पर उपयोग में आते है। सामने उपवन और नीबू का बगीचा है.…… ……
अब सीढ़ी चढ़ कर ऊपर के हाल में हम लोग आ गए। बाहर बहुत बड़ी छत है जिस पर पोते-पोती शाम को खेलते हैं । ………………
आपके आशीर्वाद से मेरा contractory का काम, बेटे की factory और बिज़नेस भी ठीक चल रहा है। सभी भाइयों की मदद करके उनका कारोबार होटल आदि लगवा दिया है, बहनों का विवाह कर दिया है, वे अपने-अपने घरों में राजी-ख़ुशी हैं !’ …………………….
रामावतार ताऊजी ने जबलपुर में जब यह वृतान्त सुना रहे थे, तभी पूज्य बाबू भी ‘ध्यान’ करके आँगन में आ गये, आगे चर्चा करते हुए रामावतार ताऊजी ने कहा :– “स्वामी शरणानन्दजी मुझे अपने पास बिठाया और पूछा —- अपने लिए क्या किया ? ” पूज्य बाबू की और मुखातिब होकर बोले,” भैया ! मैने कहा, ये सब कुछ अपने लिए ही तो किया है ! पर उन्होने और ज़ोर देकर दुबारा पूछा ‘अरे मेरे दोस्त मेरा आपसे प्रश्न है अपने लिए क्या किया ? सच कहूँ तो उस दिन यह अहसास हुआ कि सारी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी; अपने लिए कुछ नहीं किया ! मैं अभी बहूरानी और अजेय से कह रहा था कि तुमने तो परीक्षा में अव्वल स्थान पा लिया, हमने तो बस ज़रा शुरुआत की है ! ”

Permit me to share a learning episode. I had developed a fad of listening to discourses in and around Renukoot-Renusagar and taking notes for future reference. As I posted on the blog earlier, I would speak to Pujya Babuji every morning at 5.30 am and share day to day developments and my learnings,
while simultaneously keeping myself updated about Babuji’s welfare.
Once, probably in 1997, पूज्य संत नानालालजी राजगुरु ,जो पूज्य संत मुरारी बापू के गुरुभाई हैं, रेणुसागर में प्रवचन करने आये हुए थे। I would make detailed notes in every evening and like a ज्ञानी-भक्त narrate the gist to Babuji on phone the next morning. बाबूजी 3-4 दिन तो मेरे ज्ञान बखान को शान्त भाव से सुनते रहे, फिर पूछा :– ” प्राइवेट सत्संग किया ? उनसे समय माँगो और प्रश्न पूछो : ‘ साधना के लिए क्या करना चाहिए ? ‘
मुझे भला कहाँ चैन पड़ता ? पलांट रिपोर्ट डायरेक्टर को देने के बाद मैंने संत नानालालजी को फ़ोन किया और प्राइवेट सत्संग के लिए appointment समय माँगा। उन्होने सरल भाव से पूछा :– ” आज आना चाहेंगे ? मैं तो free हूँ, चाहो तो अभी आ सकते हो !

मेरी प्रसन्नता का पारावार न था।
मैने 5 मिनिट में आने की इजाज़त मांगी। उनके पास पहुँच कर, मैंने प्रवचन में मिल रहे आनन्द के लिए आभार व्यक्त किया और फिर मुख्य प्रश्न पर आ गया, ” महाराजजी साधना के लिए क्या करना चाहिए ? ”

वे बोले ; “साधना के लिए ? भैया साधना में केवल ‘नाम’ कमाई करनी होती है !
नाम जपिए, नाम लिखिए नाम सुनिए नाम गुन गाइये, नाम संकीर्तन करिये ! ”
मैंने पूछा ; ” राम कथा-प्रवचन ? ” उनका उत्तर था : ” कथा प्रवचन-चर्चा तो मन को एकाग्र कर श्रद्धा-विश्वास दृढ़ करने और अध्यात्म में रूचि जागृत करने के लिए है ! ” After the Private satsang, I walked back to my residence and spoke to Babuji’s on his mobile.
बाबूजी : ” Private सत्संग हो गया ? ”
अजेय :: ” हाँ जी ! ”
बाबूजी : ” उन्होंने क्या कहा – साधना के लिए क्या करना चाहिए ? ”
अजेय : ” उनके अनुसार, नाम कमाई करना चाहिए ! ”
जैसे ही मैंने ये कहा तो बाबूजी हँसने लगे।
मैंने लगभग आश्चर्य से उनसे पूछा : ” आपको उत्तर मालूम था ? ”
बाबूजी : ” अवश्य ! ”
अजेय : ” तो फिर अपने मुझसे क्यों नहीं कहा ? ”
बाबूजी : ” उन्होंने ही कथा ज्ञान में तुम्हें उलझाया था, मुझे लगा था उनकी बात तुम्हें अपील करती,
वैसे भी तुलसीदासजी ने “हरि तुम बहुत अनुग्रह कीन्हो में” सूत्र दिया है :’ जो ही बाँधे सो ही छोडे ‘
इस तरह बाबूजी ने मुझे ज्ञानी भक्त बनने के बजाय ” नाम कमाई ” में focus करने का निर्देश दिया।

मेरे विचार में तुलसीदासजी ने राम चरित मानस के बाल कांड में सब गुरु,देवताओं, एवं संत-असंत आदि की वन्दना करने के बाद धशरथजी, जनकजी, चारों भाइयो, हनुमानजी तथा जगतजननी सीताजी की वंदना करने के बाद दोहा 18 से 27 तक राम नाम की वन्दना करते हुए राम नाम की महिमा विस्तार से लिखी है : – वन्दऊँ नाम राम रघुवर को। हेतु कृशानु भानु हिमकर को ।। …।
राम नाम मणि दीप धरु, जीह देहरी द्वार। तुलसी भीतर बाहरेहु जो चाहसि उजियार ।।
श्रीस्वामी सत्यानन्दजी महाराज ने अमृतवाणी ग्रन्थ में राम नाम और राम कृपा की महिमा समझाई है : राम नाम मुद मंगलकरी। विघ्न हरे सब पातक हारी ।। …………।
राम नाम दीपक बिना, जन मन में अंधेर। रहे इससे हे मम मन, नाम सुमाला फेर ।।
इन दोनों संतों ने रामनाम में श्रद्धा-विश्वास जाग्रत कर “नाम कमाई” का रास्ता कितना आसान कर दिया इसका आभास पूज्य बाबूजी द्वारा लिखित ” अमृतवाणी व्याख्या ” अध्यन करने पर पता चलता है। इसमें अमृतवाणी के पदों के साथ,रामचरित मानस के references टीका सहित दिए गए हैं ।

यद्यपि श्री सत्यानन्दजी महाराज के प्रिय शिष्यों श्री भगवान दास कत्याल और श्री रामावतार शर्मा के
आग्रह पर ये भगीरथ कार्य 1970 में बाबूजी ने सम्पन्न किया था, पर मुझे लगता है यदि इसका प्रकाशन 12 वर्ष पूर्व अर्थात स्वामीजी महाराज के जीवन काल में हो जाता तो उनका आशीर्वाद इस पुस्तक को मिल जाता और साधक-भक्त जन इसकी महत्वता का सही आकलन कर पाते तथा यथोचित लाभ उठा पाते। जिन भक्तों को श्री स्वामीजी महाराज का सानिध्य प्राप्त था वे जानते हैं कि स्वामीजी महाराज भक्तकवि तुलसीदासजी, सूरदासजी, कबीरदासजी, रैदास, गुरु नानक और मीराबाई की भजन-रचनाओं को बहुत श्रद्धा से सुनते थे तथा सड़कों को सत्संग में सुनाने आग्रह करते थे।

पिछली मई 2015 की सुबह अशोक दादा का फ़ोन आया ” तुम्हे ‘ शुभ कड़ी प्रथा गणेश’ भजन के बोल याद होंगे, अभी फोन पर लिखा सकते हो ? ” पलट कर सवाल पूछना शिष्टाचार के विरुद्ध होता , अतः मैंने विनम्रता से कहा ” दादा मुंबई में पद्मजाजी के wording से बाबूजी के wording कुछ भिन्न थे, वे लिखा दूँ ? ” मेरे मत में जब कि पद्मजाजी के बोलों में ‘ उपदेशात्मक आग्रह अथवा आदेश ‘ है ;
” शुभ घड़ी प्रथम गणेश मनाओ ! ” बाबूजी के बोलों में स्वयं के लिए संकल्प है। ऐसा लगता है कि उनकी भाषा तुलसीदासजी की रचना : ” कबहुँ कहौं यह रहनी रहौंगो ” तथा श्रीस्वामी सत्यानन्दजी महाराज के अमृतवाणी के पद :” जपूँ मैं राम राम प्रभु राम ” से प्रभावित थी , तभी तो वे गाते थे :
” शुभ घड़ी प्रथम गणेश मनाऊँ ”

भोला फूफाजी की आवाज़ में पांच दशक पूर्व बाबूजी ने एक भजन टेप किया था :
” अब तुम कब सुमिरोगे राम ? ” This I feel is a question which every साधक needs to address relatedly during the day, after every task, because the commitment is :

नाम जपता रहूँ, काम करता रहूँ।
तन से सेवा करूँ, मन से संयम करूँ।।
अब वापिस पहली पोस्ट में लिखे अभीष्ट पर आते हैं।
सबका ज्ञान, क्षमता , स्वास्थ , अवस्था, परिस्थिति भिन्न हैं।
स्वस्थ-आयु-अवस्था अनुसार प्राथमिकनाएं अलग-अलग होंगीं।
Physical, Mental, Emotional and Spiritual Aspirations will determine one’s goals and drive one’s activities in various fields .
Although the scriptures define the 100 years age divided into 4 आश्रम in 25 years slot,.There is yet another school of thought dividing 100 years of age in 20 years slot each. Primarily focus in various age groups should be as follows  :–
2 -22 विद्यार्जन, ज्ञान अर्जन , सत्कर्म करने का स्वभाव बनाना,
22 -42 परिवार में उन्नति-सेवा, सकारात्मक प्रवृत्ति बनाना
42 -62 व्यवसाय में दक्षता, सम्पदा अर्जन, आध्यात्मिक उन्नति-सेवा ,
62 -82 समाज में नव-चेतना उत्थान-सेवा और तत्पश्चात सन्यास।

सभी stages में सेवा करने और नाम कमाई करते रहने का प्रयास करना  है।

सेवा के लिए विशेष सन्देश श्रीराम ने हनुमानजी से हुई प्रथम भेंट में ‘ दीक्षा ‘ देते समय व्यक्त की थी :
” सो अनन्य जा की असि, मति न टरै हनुमन्त।
मैँ सेवक सचराचर रूप स्वामी भगवन्त।।

वाणी और व्यवहार के मधुर होने की सलाह महर्षि वाल्मीकि प्रसंग एवं गुरु नानक के संस्मरण से प्रेरणा लेनी चाहिए।
वाल्मीकि जी ने निवास स्थान बताते हुआ कहा :–
” कहहि सत्य प्रिय वचन विचारी।

गुरु नानक का दूध के कटोरे में बताशे और गुलाब की पंखुड़ियों के बिखेरने का संकेतात्मक सन्देश था कि
सभी परिस्थितियों में मधुरता और सुगन्धि लाने का हमारा सर्प्रथम कर्तव्य है।
समर्पण भाव से समता में रहते हुए, उत्तरोत्तर मधुरस्वभाव द्वारा आसक्ति-अहंकार दुर्गुणों से बचना है।

Finally, I am reminded of Pujya Babuji’s assertion that श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार ‘भाईजी’ ( who was the editor of periodical ‘कल्याण’ and श्री राम चरित मानस  published by Gita Press, Gorakhpur. )
in his रचना ” तुम यंत्री मैं यंत्र …” he has surpassed सूर-तुलसी-मीरा in devotion to the LORD. All devotional renderings make prayer and submission to HIM. In this composition, the devotee EMPOWERS LORD, which makes all the difference.

This seems to be on the same mental refinement and enlightenment as expressed by Maharshi Valmikiji

महर्षि वाल्मीकिजी ने श्रीराम से निरंतर निवास के लिए ‘निजगेह’ बताते हुए कहा था :—
” जाहि न चाहिय कबहुँ कछु, तुम्ह सन सहज सनेह .”

If we combine the learnings of earlier posts with the current post, in the नित्य एकत्व साधना, it would be imperative to EMPOWER the LORD to let HIM continue with HIS duties of ” अघ खंडन, दुःख भंजन जन के ” as per HIS न्याय और दया पर आधारित मंगलमय विधान, while we as a devotee consciously shed desires, get involved in निःस्वार्थ समाज सेवा ( दुखी-ग़रीब, बीमार-कष्ट पीड़ितों की ) and ladies-children, enhancing सहज प्रेम for HIM and diligently assimilate ” नाम कमाई ” which our चित्त will carry with our soul from this life to the next life !

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