अन्तः करण – Summing up

प्रत्येक साधक जब अपनी साधना मेँ उन्नति करने की

आकांक्षा जागृत होने पर, उसे सुगम-सरस बनाने के लिए

श्रद्धा-विश्वास के साथ शांत भाव से अन्तर मुख होकर
छिद्रान्वेषण करता है। तब उसे कबीरदासजी की
तरह सत्य का प्रकाश मिलता है, और वह कहता है :–
” बुरा जो देखन  मै चला, मुझसे बुरा न कोई ! “
ज्ञान प्राप्त होने पर परनिंदा और स्वप्रशंसा
अरुचिकर लगते है।  सकारात्मक सोच एवं
सात्विक प्रवृत्ति का अनुभव होता है।
घटनाओ को बिना उत्तेजित हुए देखने की
प्रेरणा मिलती है। ऐसा भी प्रतीत होता है
कि जगत में जो कुछ घट  रहा है, वह
रंगमंच पर हो रहे किसी नाटक के सामान है।
तुलसीदासजी ने ज्ञान बाँटते हुए
श्रीराम चरित मानस लिखा है :–
” मोह निसा सब सोव निहारा।
   देखत स्वप्न अनेक प्रकारा।।
स्वामी सरणानन्दजी के संत वचन स्मरण आते हैं :-
“प्रभु ने सभी को सीमित बुद्धि और शक्ति दी है। “
बाबूजी ने मार्ग निर्देशन देहु रिकॉर्ड किया है :—
 ” सब श्रीराम के मंगलमय विधान से होता है
  जो न्याय और दया पर आधारित है ;
    समर्पण भाव से समता में रहना है।  “
सुख पाने की लालसा आदि काल से मानव में रही है।
मृगतृष्णा की भांति ‘सुख’ सहजता से प्राप्त नहीं होता।
स्वाभाविक प्रश्न है  : ” ‘सुख’ मिले कैसे ? “
श्रीकृष्ण गीता में पूछते हैं : ” अशान्तस्य कुतः सुखम ? “
संत वचन है ” सुख देने की लालसा ही
सुख पाने की दासता से मुक्त करती है ! “
इसी के युग के भक्त कवि ‘पथिक’ जी महाराज
अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए, प्रार्थना करते हैं :–
” सुख के लिए लाखों दुःख सह कर,
 ये दिन अभी तक योन ही बिताए
…….…………. ………
 हे नाथ अबतो ऐसी दया हो,
 जीवन निरर्थक जाने न पाये “
स्वामी अखंडानन्दजी के मत में  :
“गीता का वास्तविक ज्ञान के बारहवे
अध्याय के 20 श्लोकों में दिया गया है।
पहले ग्यारह अध्याय उसकी भूमिका हैं ,
और बाद के छः अध्याय उपसंहार !
बारहवे अध्याय में श्रीकृष्ण भक्त के लक्षण
िरूपित करते हुए कहते हैं :—
” संतुष्टः सततं योगी यतात्मा ढ़ृड निश्चय
   ……………………….…………
संत वचन याद आ रहे हैं। ये  साधना सूत्र प्रदान कर,
रोज़ की हाय-हाय से बचाते है और
‘संतुष्ट’ रहने की अद्भुत कुंजी  हैं :–
” शरणागत को आवश्यक वस्तु। …….. …
बिना मांगे मिलती है। ………… … और
अनावश्यक वास्तु मांगने पर भी नहीं मिलती।”
पूज्य बाबूजी के आध्यात्म पर हुए 2 वार्तालाप अविस्मरणीय हैं।
श्री अरविन्द आश्रम दिल्ली के ट्रस्टी श्री सुरेन्द्र नाथ जौहर ‘ फ़कीर ‘
को सभी परिचिन including बाबूजी ” चाचाजी ” कह कर पुकारते थे।
एक बार अपनी आवश्कताओं को सीमित करने पर बाबूजी, “चाचाजी”
के कमरे में उनसे चर्चा कर रहे थे। That day, they together evolved
a yard -stick :–” Can I do without this ? ” By force of habit,
Pujya Babuji wrote it down on a piece of paper and carried
it to his room. While contemplating, he added one letter to the
formula and shared it with Chachaji. He simply jumped as
it then read “Can I NOT do without this ?????
Any one running after wealth, name or fame,
sacrificing HEALTH would get inspired.
On another occasion, Babuji was having
a dialogue with Durga Pd. Mandelia Tauji.
Tauji was saying ” Everyone’s duty has,
defined by the profession s/he follows.
An engineer designs and operates a
machine or a plant; a doctor treats or
operates on a patient, a manager controls
an organization, a lawyer prepares and
argues client’s case; so on and so forth.
The main question is :–
” What is the duty of GOD ? …
   भगवान के क्या कर्तव्य है ? “
  भक्त तो केवल प्रार्थना करता है :
” हरि ! तुम हरो जान की पीर ! ” और
 ” नाथ मोहे अब कि बेर उबारो ! “
  पर भगवान के कर्तव्य कभी भी,
  कंही भी,किसी धर्म भी में,
 किसी भी भाषा में नहीं बताये गए है  ! “
 उन्होने यह भी condition लगाई कि
 उत्तर  पूर्णतः स्पष्ट और सुप्रसिद्ध दार्शनिक
 अथवा कवि की अभिवक्ति होना चाहिए।
 बाबूजी ने विचारकर कहा :- ” भगवान के
 कर्तव्य की बात सगुन उपासक भक्त कवि ही
कह सकता है और कही भी है, आप उनकी
 रचनाऍ नित्य प्रातः प्रार्थना में गाते भी है
……………..…… वह है …………
” अघ खण्डन, दुःख भंजन जन के ,
  यही तिहारो काज। ……….
…. रघुवर तुमको मेरी लाज !”
And now at the fag end of today’s post
a story of a worker, who rose to be
head of an institution.
An employer recruited a worker Shyam for
his factory. With the enhanced knowledge,
skills and dedicated service to the company,
Shyam kept rising up the ladder and within a
decade  became its General Manager.
Shyam had an ante room, adjoining his
official chamber. On its one side was a wooden
cupboard, which used to remain locked all the time.
The key of the wooden cupboard  was always in
Shyam’s pocket.
Shyam had a peculiar habit. On reaching his office,
he would first go to the ante room, and after bolting
the room, he would open the cupboard once and after
locking up again, he would unbolt the ante room and
then would go to  his chamber to begin his normal work.
Every officer and  staff noted this routine of Shyam.
Those officers, who were jealous of Shyam’s excellent
performance and progress, connived against him and
expressed to the owner their apprehension about
Shyam’s integrity.
On a Monday morning, as soon as Shyam reached the
factory, he received a call from the owner. Shyam followed
his routine almost like a ritual. As soon as he opened the
ante room door, the auditor said in rather stern manner
to immediately open the wooden cupboard. Shyam
pleaded that he be permitted to keep it closed as
had something personal in it.
But, the jealous officers including auditors
insisted that his request was unacceptable
and demanded that the key to the cupboard
be handed without a second’s delay.
Shyam said that in that case, he would like to go out.
At this development, one auditor remarked,
” Even otherwise, we shall sack you, once the cupboard
   reveals the assets concealed by you .”
Shyam reluctantly gave the cupboard keys.
When the cupboard was opened, the owner,
auditors and other officers were amazed
to see a set of old worn out  clothes,
which Shyam had worn on day one,
when he had come to the factory
as a new recruit.
जबकि ऑडिटर की आँखों से शर्म के आँसू झर रहे थे,
श्याम की आँखों में ईमानदारी की चमक थी !
मालिक के मुख से निकला,   : –
” दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी,
ज्यों की त्यों धर दीन्हि चदरिया ….
 वाह श्याम तुम धन्य हो “
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