Hay stack syndrom

We are aware of the proverb :
” It is difficult to find a needle in a stack of hay. “
We agree to this statement of fact and have no second thoughts on this issue.

Once Pujya Babuji came to Renusagar to stay with us for a few days. As he normally stayed in the Puja Room, during all his visits to R’sagar, I took extra care to collate all the spiritual books , booklets and notes in the Puja almirah and arranged them in 2 shelves, so that he may have easy access to the spiritual library in his free time.

Upon arrival, he had a small chit-chat with Amita, kids and myself. When he settled down and had a glance on the spiritual library, he asked, ” यह क्या ? इतनी सारी किताबें ! “
When I let the cat out of the bag, spelling out the objective, he said,
” स्वाध्याय नियमित रूप से अवश्य करना चाहिए, पर ‘जीवन यात्रा ‘ में
5 / 7 पुस्तकों का गूढ़ अध्ययन कर उन्हें आत्मसात करने का प्रयास करो !”
He made me make a selection then & there. He remarked,
” It might take you several years to translate all the learnings into reality. But what is significant is that they should be relevant to your chosen path and you should enjoy going thru’ them. In case you find any book too terse, exchange it for something more lucid and interesting! ”

I must add here, he was very assertive in his communication and appreciated the talent of Amita and children. He always praised regularity in दैनिक प्रार्थना both in the morning and evening.
Although he was never in favour of ” daily club life”,
he was particular about keeping a track of sports and health endeavours. This above all he would insist upon a communication forum with children and an oppotunity for fun-humour-laughter every evening.
I remember, we had arranged his talk in the Lions Club.
When he came back, it was late evening and children had settled down to finish their school assigment “home work .”
He called out to ” Bhawani-Bitiya Rani-Gudiya Rani ” and asked,
आज कोई cards trick, स्वांग (धोबिन ) / कविता ( भारतीय रेल) का प्रोग्राम नहीं है ?
To conclude,
1. We need to have focus on 5 /7 books or booklets for
    intensive study, as per our chosen path,
2. Keep library for स्वाध्याय neatly categorized and
    accessible at an arm’s length.
3. पारिवारिक दैनिक प्रार्थना महत्वपूर्ण है। पर communication
   forum and entertainment are equally significant.
4. It is of paramount importance to take spiritual inventory
    on regular basis and make note of their “physical address”
    and the “bin”.
5. More importantly, absorb the fundamental principles and                         LIVE them day in and day out, for meaningful progress,
    whether or not one becomes a ‘role model’ or not.
    It shall save us from the need to memorize them
    and the taxation of recalling them from memory.
मेरे संकल्प है :—
1. उद्देश्य पूर्ण श्रेष्ठ जीवन सुगम. सरस, सार्थक तथा मनोरंजक कैसे बने
     यह जीवन कला सीखना आवश्यक है। अतः उसे अपना स्वभाव
      बनाने का सतत प्रयास कर साधना का महत्वपूर्ण अंग बनाऊंगा !
2. I shall concentrate on the Meditation cassette,
    भावांजलि भाग-2,अखंड साधना, साधना सूत्र, अतीव में प्रिय, अतिसय प्रिय मोरे
    and other small booklets, which are in fact condensed
    notes of Pujya Babuji. I shall FOCUS on one booklet at a time.
    I shall draw a ” to do ” agenda and a structured review
    mechanism on the line of ” As is ” and ” To be ” gap.
3. I shall resume intensive ” निज सत्संग ” तथा ” अन्तर मन “वार्तालाप
    in a more systematic fashion early in the morning at the
   ” Meditation hour. ” on the lines of Gurudev’s guidelines.
4. My assignment is to IMPROVE my own self.
    देश-दुनिया और बंधू-बांधव को सुधारने का ठेका प्रभु का है
    और उन्हीं का रहेगा ।  Period ……. over. All over.
5. Continue to practise “Ignore and let go ” and
    ” Not to get provoked, ” and finally
    ” न किसी से अपेक्षा ; न किसी की उपेक्षा “
6. Take inspiration from recent developments and prompts :–
    ” मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ ! “
    ” कुछ बन न पाया मेरे बनाए ! “
    ” तुम अपना रंजोग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो ! “
    ” ऐ राद न कर फ़िक्र ! “
    ” अघ खंडन दुःख भंजन जन के, यही तिहारो काज ! “
    ” जाएगी लाज तुम्हारी, नाथ मेरो काह बिगरेगो ! “
    ”  करुणा सागर कहलाते हो, कुछ तो करुणा कीजे ! “
    इन्हीं शब्दों के साथ आज के सत्संग को विराम देता हूँ !
    जय सीताराम !
 – Ajey.

” मै कौन हूँ ? “

स्वामी गोविंददेव गिरी जी के सिंगापुर में हुए प्रवचन पश्चात,
मेरे अनुज प्रिय अनिल ने दूसरा प्रश्न पूछा था,  ” 

मै कौन हूँ ? “
“क्या मैं शरीर हूँ ? ” “क्या मैं आत्मा हूँ ? “
” यदि मैं शरीर अथवा आत्मा नहीं हूँ, तो क्या हूँ ???
1. Swami Govinddev Giri ji has rightly recalled that रमनमहर्षि     ने साधना-शोध इसी प्रश्न ” मैं कौन हूँ ?” पर किया।
    Dr. S. Radhakrishnan would go and sit for hours and
    draw inspirations from the vibrations pervading in
    ashram of रमन महर्षि।
    Dr. Radhakrishnan was of the view that what he taught
    to students of Philosophy, Sri Raman Maharshi had
    practised in his मौन साधना।
2. हम गृहस्थ साधकों के लिए पूज्य बाबूजी ने हनुमानजी महाराज के
    फोल्डर में सोमवार का प्रारम्भ दार्शनिक विचार से किया है ।
    श्री हनुमानजी का श्रीराम से कथन है : ” देहदृष्ट्या तु दासोSहं …..”
    अर्थात देह दृष्टि से आपका दास हूँ, जीव दृष्टि से आपका अंश हूँ,
    आत्म दृष्टि से जो आप हैं, वही मैं हूँ !
3. भावाञ्जलि भाग -2 के पेज 10 में जीवात्मा ( मै’को पहचानो ) शीर्षक
    से इस महत्वपूर्ण विषय पर पूज्य बाबू ने  पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।
4. In the ‘Sadhna Path’ published by Bhartiya Vidya Bhavan,
    in Sunday sadhna, under heading “परमात्मा,जगत,जीवात्मा ”     Pujya Babuji has dealt the subject by quoting from both
    रामचरित मानस and श्रीमद्भगवतगीता :—
    ईश्वर अंश जीव अविनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी।।
     सो माया बस भयहु गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं।।
     उपद्रष्टानुमानता च भर्ता भोक्ता महेश्वर । 
     परमात्मेति चाप्युक्तो देहेSस्मिन्पुरुष परः।।
5. गोस्वामी तुलसीदासजी ने ‘ तू दयालु दीन हों ‘ पद के अंतिम भाग में
    निवेदन किया है :–
    “तोहि मोहि नाते अनेक, मानिए जो भावे, 
     ज्योँ त्यों तुलसी कृपाल, चरण शरण पावे।।”
6. पूज्य बाबूजी की 1950-52 की भक्ति रचना है :–
    मैं तो तेरा हूँ, तेरा हूँ, तेरा हूँ राम !
    तू तो मेरा है, मेरा है, मेरा है राम !!  
    इसी भाव की एक और रचना उन्होंने की थी :-
     तन है तेरा, मन है तेरा ; प्राण हैं तेरे, जीवन तेरा। 
     सब हैं तेरे, सब है तेरा ; मैं हूँ तेरा, तू है मेरा।    
  7.  Let us recapitulate the fundamental principles,
       enshrined by Pujya  Babuji in the Meditation cassette.
     पूज्य बाबूजी श्रीराम के मौलिक गुणों का स्मरण करने के बाद कहते हैं :
     राम सृष्टा है, राम भरतार है, राम करतार है।
     राम सब में है,राम में सब है, राम ही सब है।
     राम अनुमन्ता है, राम भरता है, राम भोगता है।
     मैं कुछ नहीं करता …………………………….
     मैं यंत्र, राम यंत्री ;
     मैं काठ की पुतली, राम सूत्रधार ;
     मैं अकल खिलौना, राम खिलार।
     मेरा कुछ नहीं, सब राम का है ;
     ट्रस्टीवत सबका सदुपयोग करना है ;
     दुरुपयोग का अधिकार नहीं।
     मेरा कोई नहीं , सब राम के हैं ;
     सबकी मर्यादानुसार सेवा करना है ;
    सब राम के मंगलमय विधान से होता है ,
    जो न्याय और दया पर आधारित है।
    समर्पण भाव से, समता में रहना है !
      मुझे कुछ नहीं चाहिए ………
      मुझे राम कृपा चाहिए ………
      मुझे राम दर्शन चाहिए ……..
      मुझे राम चाहिए !
      मुझे राम चाहिए !
      मुझे राम चाहिए !
मुझे यह लगा कि प्रिय अनिल ने प्रश्न पूछ कर सिंगापुके भक्त-श्रोताओ को श्री स्वामी गोविंददेव गिरी जी अमृतमयी ज्ञान गंगा में स्नान करवाया ।
साथ ही साथ हमें अपनी पिटारी का पुनरावलोकन करने को प्रेरित किया और हम गुरुदेव की महानता-महिमा को याद कर धन्य हुए !
इन्हीं शब्दों के साथ आज के सत्संग को विराम देता हूँ !
जय सीताराम !

” भगवान से हम कैसे जुड़ें ? “

समन्वय परिवार के मुखिया तथा निर्वर्तमान शंकराचार्य परमपूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्दजी गिरी महाराज
के सुयोग्य शिष्य, जो भारत माता  मंदिर के अध्यक्ष हैं, स्वामी गोविंददेवजी  गिरी
महाराज पिछले दिनों सिंगापुर  गए हुए थे।  उनके एक प्रवचन बाद,
मेरे अनुज प्रिय अनिल ने उनसे 2 प्रश्न पूछे थे।
पहला प्रश्न था :— ” भगवान से हम कैसे जुड़ें ? “
1. यह प्रश्न 1953 में पूज्य श्री आनंदमयी माँ से पूज्य बाबूजी ने  पूछा था।
     बाबूजी के प्रश्न का मुख्य मुद्दा ‘जुड़ना’ न होकर ‘जुड़े रहना ‘ था। पूज्य
    आनंदमयी माँ ने उन्हें ‘एक गृहस्थ माँ और शिशु’ का उदाहरण दिया था।
2. रामचरित मानस के सुन्दर काण्ड में विभीषणजी के शरण में आने पर
    श्रीराम ने उपदेश में कहा :—
     सबके ममता ताग बटोरी।  मम पद मनहि बाँध बर डोरी।।
3. All the practical and attitudinal aspects have
     been dealt up with in the meditation cassette, when
     Babuji deals with the वस्तु-व्यक्ति-परिस्तिथि,,,…………..
    one at a  time ………and links each of them with श्रीराम।
4. The book-let entitled ‘अखंड साधना’ is designed to throw
    more light on finer aspects of  नित्य एकत्व from ab initio.
5. Recalling an incidence involving  श्री रामकृष्ण परमहंस
    when a devotee complained about “no darshan” of the
     Lord  despite several years of साधना।  He asked him,
    ” आज दर्शन करना हो तो चलो मेरे साथ ! “
     What happened at गंगा स्नान is history and so also
     श्रीरामकृष्ण की उक्ति about aspiration to see HIM.
6. Swami Govinddevji has referred to the ideology followed
    by भरतजी in governing अयोध्या for almost 14 years :–
  a. नित पूजत प्रभु पावरी प्रीति न रिदय समाती ।
      मांगी मांगी आयसु करत, राजकाज बहु भाँती।।
  b. पुलक गात हिय सिय रघुबीरू ।
     जीह नाम जपि लोचन नीरू।।
  c. राम लखन सिय कानन बसहीं।
      भरत भुवन बस तप तनु कसहीं।।
 7 . स्वामी गोविन्ददेव गिरी जी ने श्रीरामकृष्ण परमहंस के सुप्रसिद्ध
   उदाहरण ‘ बन्दर का बच्चा ‘ तथा ‘ बिल्ली का बच्चा ‘ का उल्लेख कर
    ज्ञानी भक्त और शरणागत भक्त की प्रवृत्ती तथा मार्ग पर चलने
    अर्थात जुड़ने की सुगमता / प्रतिकूलता का बोध कराया है।
   This was emphatically communicated when Pujya Babuji
    gifted to me ‘ The gospel of Sri Ramkrishna ‘ तथा जबलपुर
    के रविवार सत्संग में गीता पाठ और उस पर हुई व्याख्या पर
    हरिगीता के बारहवें अध्याय के पांचवें छंद में गाया :—
    ” अव्यक्त में आसक्त जो होता उन्हें अति क्लेश है……. “
8. जुड़ने का सरलतम साधन है नाम शरणागति भावमय नाम संकीर्तन :–
    तन है, तेरा मन है तेरा;
     प्राण हैं तेरे, जीवन तेरा……
9. Without casting aspersions on anyone, let me admit that
    I do strongly feel that I have not understood the
    value of the books and booklets given to me, in our
    formative age.
     Moreover, I tend to forget what I got as an endowment,
     without any extra effort.
     Of late, I have realized that this is how HE has designed
     these events. They enable us to revisit and recapitulate
     our old learnings.
    At this juncture, let me recall किष्किन्धा काण्ड में  श्री हनुमानजी
     महाराज का प्रभु श्रीराम से मिलन पर कथन ( जो वास्तव  में भक्त की मनोदशा
    का वर्णन है ) :–
   ” एक मैं मंद मोह मति, कुटिल ह्रदय अग्यान।
      पुनि प्रभु मोहि बिसरेहु दीन बंधु भगवान।।
10.  Swamiji has very humorously remarked the need for
      meditation time and to begin with finding opportunity to
      connect with HIM, doing ‘Hi’ and ‘Bye’ , while going &
      returning from office / work place.
11. Almost 2 months ago, Bhola Phuphaji sent on Whatsapp,
     a devotional song from movie राम नगरी :–
     ” मै तो कब से तेरी शरण मे हूँ ! ” इसके अँतरे के भाव बहुत सुन्दर हैं :-
     ” तेरी आरती का दिया बनूँ, यही है मेरी मनोकामना।
     मेरा प्राण तेरा ही नाम ले, करे मन तेरी ही उपासना।
     गुनगान तेरा ही मै करुँ, मुझे ये लगन भगवान दे।
     मैं तो कब से तेरी शरण मे हूँ।
   इन्हीं शब्दों के साथ आज के सत्संग को विराम देता हूँ।
   जय सीताराम !
– Ajey.

नित्य प्रत्याहार,धारणा तथा ध्यान स्थिति नोट्स

जो साधक नित्य एकत्व साधना के मार्ग पर चलने को कटिबद्ध हैं

उन्हें नित्यप्रति ध्यान अवस्था में जाने का अभ्यास करना चाहिए।
जैसा पिछले ब्लॉग पोस्ट में चर्चा कर चुके हैं,
प्रत्याहार और धारणा के बाद
ध्यान अवस्था में जाना सुगम होता है।
प्रत्याहार ( शारीरिक विषयों से वैराग्य )
के लिए चेतावनी भजन तथा विरक्ति
भक्ति रचनाओं का गायन सहायक होता  हैं।
स्नान की तैयारी करते हुए  पूज्य बाबूजी
भक्त संत कबीरदासजी, ब्रम्हानन्दजी 
और गुरु नानक के जो भजन गाते थे, उनका
महत्व और गूढ़ता अब समझ में आ रही है।
1. अवसर बीतो जाये रे प्राणी !
2. रे मन मूरख जनम गवाओ !
3. जपो रे राम नाम सुख दायी !
4. जगत में जीवन दो दिन का !
5. जनम तेरा बातों ही बीत गयो !
6. रे मन प्रभु से प्रीत करो !
यदि हम आसक्ति से ग्रस्त हों तो
स्वामी शरणानन्दजी महाराज की
रचना याद करके निज सत्संग करें :–
” मैं नहीं मेरा नहीं, यह तन किसी का है दिया।
जो भी अपने पास है वो सब किसी का है दिया। “
यदि अभिमान की प्रचुरता हो तो 
स्वामी सत्यमित्रानन्दजी के
परामर्श पर अमल करके
विनय पत्रिका के पद गायें :–
” ताहि ते आयो सरन सवेरे।”
” यह विनती रघुवीर गोसाईं। “
धारणा के लिए ज्योति जला कर त्राटक करना उपयोगी होता है।
नाम जप कर, ” यतो यतो निश्चरति। ……… ” आदेश का पालन करके
स्वामी सत्यानन्दजी महाराज का समर्पण भजन
” बसे रहो श्रीराम ….” के साथ ध्यान अवस्था
में जाने के लिए ‘धारणा’ संपन्न कर सकते हैं।
तत्पश्चात ध्यान अवस्था में जाने के लिए  INNOVATION का मुख्य रोल है।
स्वामी अखण्डानन्दजी महाराज के ‘ भक्ति योग’ में दर्शाये मार्ग पर चल सकते हैं  ……
कलात्मक रुचि से रमणीय स्थान चुनकर मानसिक रूप से इष्ट का श्रृंगार करके अपने मन पसंद फूलों से
स्वागत करें, झूला झूलें, नौका विहार, नृत्य-संगीत फल-पकवान का, रसास्वादन करें, मन की बातें कहें।
The canvas, the mood, the agenda, schedule everything would be
as per the individual devotee’s exclusive design and unique choice.
To break the monotony, s/he can bring about variety at one’s sweet will.
It is for this reason that oft posed question is : ” What gives ‘you’ joy ? “
It is imperative for us to know the liking and taste of of the LORD, who
resides within us, so that we provide joy and make a lasting impact
through our various mental-emotional-spiritual offerings to HIM .
In the absence of this vital information, how can we make the
choicest offering to our LORD and really please HIM ?
It would also be prudent to mull over innovative stride
to offer newer creations at His Lotus Feet every day !
मेरे विचार से हमें अपने इष्ट को ध्यान अवस्था में रिझाने के लिए
किसी वाह्य साधन अथवा सामग्री की आवश्कता नहीं होती।
पूज्य अम्मा का सारगर्भित सूत्र “ भक्ति भावना से होती है
का तर्क और अर्थ अब समझ में आया।
हमें न तो कोई सुन्दर सजा पूजा मंदिर चाहिए,
न कोई मन्त्र-स्तुति-प्रार्थना-भजन चाहिए,
न कोई स्वादिष्ट पकवान प्रसाद-फल चाहिए,
न कोई बंधु-बान्धव-मित्र का समूह चाहिए।
हाँ चाहिए पूर्ण समर्पण भावना,
प्रभु को पाने की तीव्र अभीप्सा,
राम कृपा-राम दर्शन की अभिलाषा,
दिव्य मातापिता सीताराम का सानिध्य
All that we need is SIMPLE pius HEART
प्रभु श्रीराम ने सुन्दर काण्ड में विभीषण से मिलने के पूर्व घोषणा की  :–
 ” निर्मल मन जन सो मोहि पावा।  मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। “
प्रभु श्रीराम ने उत्तर काण्ड में भक्ति मार्ग नगरवासियों को समझाते हुए कहा :–
सरल सुभाव न मन कुटिलाई।  जथा लाभ संतोष सदाई।।
 पूज्य बाबूजी ने
ऑडियो कैसेट में closing
prompt कहा है :—
मुझे राम कृपा चाहिए !
मुझे राम दर्शन चाहिए !
मुझे राम चाहिए …… 
मुझे राम चाहिए .……. 
मुझे राम चाहिए ……। 
ध्यान अवस्था में दिव्य माता-पिता का
अपार स्नेह अविरल प्राप्त करने की
नित्य प्रति प्यास बढ़ती ही जाए तो….….
‘रह न सको बिन प्रभु तुम भी’ स्थिति होगी
समाधी बात-बात पर लगने लगेगी ……
जैसा Gospel of Ramkrishna में
ईश्वर चंद विद्यासागरजी के बारे में वर्णित है  !
श्रीहनुमान प्रसादजी पोद्दार ‘भाईजी
के शब्दों में हम  ‘ जीवनमुक्त ‘ हो जाएंगे !

Getting into Meditative State for DIVINE BLISS

महर्षि पतञ्जलि के अष्टांग योग का उल्लेख हमने पिछले ब्लॉग पोस्ट में किया था ।
वे हैं :  यम, नियम , आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार , धारणा, ध्यान तथा समाधी।
हम ने यह मान लिया था कि अभ्यासी साधक को प्रथम 6 अंगों की आवश्यक विस्तृत
जानकारी है तथा वे नियमित रूप से उसका अनुशासन के साथ पालन कर रहे हैं।
ज्ञान की श्रंखला टूटने न पाये इसलिए योग के अंगों का संक्षिप्त परिचय दे रहे हैं ।
 यम –   अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (Behavioural discipline )
नियम – शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान ( Self discipline)
आसन – Exercises for maintaining flexible and healthy body
प्राणायाम – Breathing exercises for stronger lungs and  inward focus
प्रत्याहार – Letting go of the attachment to senses
धारणा – Concentration
ध्यान – Meditative State
समाधी – Prolonged Divine Bliss in Meditative State.
Even at the cost of repetition, salvation (मोक्ष ), परमात्मा  (श्रीराम) और उनकी कृपा का दर्शन
तथा अपार आनन्द ( Unbound Bliss) की अनवरत प्राप्ति अभी और सदैव form the salient objectives
of life. In Management parlance , DIVINE BLISS ( आनन्द ) is the ‘VISION’ ;
and our mission is constant communion with the LORD,which Pujya Babuji
called नित्य एकत्व साधना।
एक कहावत हम सब स्कूल में सुन चुके ” हैं करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान !”
अतएव, नित्य प्रति, अन्तर्मुख होकर, ध्यान अवस्था में रहने के अभ्यास की नितान्त आवशकता है।
साधक ध्यान अवस्था प्राप्त सहजता से प्राप्त नहीं कर पाते इस कठिनाई का उल्लेख कई मार्गदर्शक
गुरुओं के प्रवचन के बाद के प्रश्नोत्तर काल में कई TV कार्यक्रमों में देखा-सुना है।
अतएव, इस विषय पर यहाँ चर्चा करना असंगत नहीं है।
Let me try the Harvard ‘case study’ methodology  to address the issue.
I had gone to the Harvard Business School(HBS) in March 2003
to do their highest professional course called the Advanced
Management Program ( AMP). As most of management graduates
and post- graduates know, Harvard is considered to be ‘Mecca’ of
Management ‘. HBS is famous for its ‘case study’ methodology
of education for imparting knowledge in the Management field.
I was a favourite student of Prof David Garvin, a leading faculty and
an authority on General Management, whose authored books are
prescribed for MBA and refresher courses for professionals, in the
the Management Institutions world over in general and Indian
Institutions in particular,
Prof. David Garvin in my personal one-to-one talk in April 2003,
shared the back-ground philosophy of the ‘case study’ approach.
He said, ” History may not repeat itself, but posing a ‘ what if ‘                                                                                       question, enables every manager to visualize and prepare if a
similar challenging situation were to be faced by him /her in future.
Taking a cue from Prof. Garvin, let me recall and consider my dialogue
with Pujya Babuji ( my Gurudev) on the subject, and revisit the dialogue,
held with Gurudev almost 20 years ago. Mind you, I had by then been into
spiritual साधना for over 30 years and was nearing 50 years of my physical life.
It was more or less a confession to Pujya Babuji ( Gurudev) :—
मैं : ” ब्रह्म मुहूर्त में ध्यान लगाने की कोशिश करता हूँ, पर ध्यान नहीं लगता  !”
बाबूजी :  ” ये वह साधक ही कह सकता है, जो प्रयास करता है ! “
उन्होंने फिर पूछा : ” क्या होता है ? “
मैने कहा : ” आँख बंद करते ही ऐसा लगता है,  जैसे विचारों का ट्रैफिक खुल गया हो। “
बाबूजी : ” फिर क्या होता है ? “
मैं : ” ऐसी विचारों की ‘आंधी’ चलती है ; लगता है  bombardment’ हो रहा है । “
बाबूजी : ” तो फिर क्या करते हो ? “
मैं : ” अभ्यास-वैराग्य से मन को वश में करने की कई बार कोशिश की पर, असफलता हाथ लगी “
बाबूजी : ” अन्त में क्या हुआ ? “
मैं : ” आँख खोलनी पड़ी, आसन छोड़ कर उठना पड़ा ! “
बाबूजी : ” ऐसा कितनी बार हुआ ?  कुछ हट कर different भी हुआ ? “
मैं : ” दर्जनों बार ; एक दो बार तो mentally इतना थक गया कि पूजा कमरे में ही सो गया ! “
Babuji assured me that several other devotees have had similar experience.
He advised me not to get dis-heartened. He said ” बेटा ! ध्यान किया नहीं जाता, होता है ! “
He asserted, “We do not meditate ; in fact, we get into meditative state ! “
He went on to explain as to how the problem of ” thoughts traffic ” could be addressed.
The FIRST effective method had been advocated by Sri Aurobindo. He had asserted
that one must close the door forcefully on the face of intruding thoughts. This is akin to
‘mind fullness’ style propagated by Lord Buddha, Swami Yoganandaji and ‘hath yogis’.
However, Pujya Babuji pointed out that this requires strong will power.
The SECOND effective method was advised by Mother of Shri Auobindo Ashram.
She asserted that the thoughts behave like monkeys, which keep on jumping until
the extra energy ( that they seem to possess ). After some time, the monkeys  lose
their jumping tendency, and the mind coolly gets back to normal behaviour.
This style is followed by Brahmkumari’s and many ashrams of Mathura-Brindavan.
But Pujya Babuji pointed out that this requires lot of patience.
The THIRD effective method was suggested by Swami Sivanand ji . He introduced
the concept of meditation time to be akin to ” appointment ” with the Supreme LORD.
The “thought ” were to be told to “register” themselves as guests, to whom we will
get back immediately after meeting the Supreme LORD himself, the King of KINGS.
This enables one to achieve what Yogis call विचार शून्य स्थिति (Thoughtless state)। 
The last method seems to be a practical solution for professionals and office goers.
In this process of emptying out the mind, the entire laundry list gets of thoughts,
occupying the mind gets prepared and upon prioritizing and clubbing / refinement,
one gets a well structured  “To do” list for the day, week, month, season or year.
Going by one’s attitudinal assessment and the situation, one can make a choice.
 Pujya Babuji informed me that Swami Santananda ji followed this methodology and
as per her Guru’s candid advice, she developed a practice of always keeping a diary
and pen at an arm’s length even at her bed side to jot down ‘inspirational ideas’
whether stray thoughts or problem solutions or composing poems.
For emptying out the mind after practising प्रत्याहार / धारणा ,
one can read a book or listen to discourse of one’s Guru
or Ideal. Some people listen to instrumental music or  भजन।
I feel blessed because Pujya Babuji (My Guru ) gave me an
audio tape with ‘prompts’ recorded in his own voice, which I
listen to in the early hours to get into the Meditative state.
Beyond the meditative state as one is into  विचार शून्य स्थिति 
and the canvas is absolutely clean, one can paint the picture
of one’s Divine Father/ Master / Beloved / Parents / Friend as
per one’s chosen “Path” and with location as per one’s own
state of health and back-ground and sit-sing-dance-talk or
communicate as per on’s own sweet will and tune, in one’s
own thoughts,words or feelings with absolutely no guidance,
rules or restrictions. After all it is an occasion for communion
of the आनन्द के लिए छटपटा रही आत्मा with सच्चिदानन्द परमात्मा।
At this stage as time. place and manner lose significance,
Yogis are known to have experienced DIVINE BLISS and
have gone into Samadhi several times and for many hours.
Lest we should get entangled in the web of joy & sorrow,
poet HW Longfellow has given a definitive direction in his
immortal poem ‘ The Psalm Of Life’ :—
Not enjoyment and not sorrow
Is our destined end or way,
But to act that each tomorrow
Finds us farther than today !
यदि कोई हमसे पूछे कि ख़ुशी-आनन्द पाने के क्या तरीके हैं ?
तो मैं उन्हें पूज्य गुरुदेव के छाया-माया दृष्टांत को सुनना चाहूँगा।
हमारे शुभ विवाह को कुछ ही महीने हुए थे।  एक रविवार को सत्संग के समय
अमिता  और मुझ से quizzing करते हुए बोले, ” कोई एक है जो मेरे साथ हर दम
रहती है, मेरा साथ ही नहीं छोड़ती, बताओ क्या है ?
हम लोग सोच रहे थे कि बाबूजी ने आगे कहा ” हर समय साथ चलती है, साईकिल
पर चलूँ या दौडूँ, मुझ से चिपके ही रहती है। हाँ दिन में 12 बजे कुछ क्षण को साथ
छोड़ती है, पर फिर साथ लग जाती है।
अमिता ने तपाक से कहा ” अरे परछाई है ! “
बाबूजी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ” शाबाश ! अपनी ‘छाया’ की तरह प्रभु की ‘माया’
का भी यही हाल है।  वह हमारा साथ नहीं छोड़ती ! केवल जब प्रभु की कृपा सिर पर होती है
या जब साष्टांग प्रणाम करते हुए ( पूर्ण समर्पण भाव में होते हैं ) तब माया लुप्त होती है ! “
मैने वार्तालाप में भाग लेते हुए निवेदन किया कि एक स्थिति और है……..… जब  हम
घर के अन्दर चले जाते हैं तब ‘छाया’ ग़ायब हो जाती है !……….
बाबूजी बोले, ” बिलकुल ठीक ! इसीलिए जब हम अन्तर्मुख होते हैं, प्रभु का आश्रय लेते हैं,
तब माया साथ छोड़ देती है। “
उपरोक्त दृष्टांत से यह समझ में आया कि………
AA .  हमें सुख-ख़ुशी तब मिलती है, जब हम प्रभु कृपा से
1. कर्तव्य कर्म करते हुए, चुनौतियों का सामना करके सफलता हासिल करते हैं , (स्वकर्म में उत्कर्षता )
2. दीन-दुखी-दरिद्र , रोगी, अक्षम बालक, महिला,वृद्ध की सेवा करते  हैं , ( परिवार तथा समाज सेवा )
3. अनुशासित रह कर अध्ययन करके ज्ञान, क्षमता और सकारात्मक प्रवृति बढ़ाते हैं । (ASK triangle )
BB. हमें शान्ति-ख़ुशी तब मिलती है, जब हम प्रभु प्रेरणा से
1. सात्विक आहार और नियमित व्यायाम से शरीर स्वस्थ निरोगी रखते हैं ,  ( स्वास्थ्य )
2. प्राप्त सम्पदा और वैभव को प्रभु प्रसाद मानकर संतोष मय जीवन निर्वाह करते हैं  (संतोष )
3. इच्छाएं कम करके , सहनशील और संयम में रहकर, स्वावलम्बी बनते हैं । ( संयम-नियम )
CC. हमें  अपार आनन्द नित्य तब प्राप्त होता है, जब हम गुरु की आज्ञा-प्रोत्साहन पर
1. सात्विक विचार वचन और व्यवहारसे उठकर दैविक स्वभाव बनाते हैं , (स्वभाव )
2. निज सत्संग द्वारा छिद्रान्वेषण करके निरंतर प्रगति करने का प्रयास हैं , (निज सत्संग )
3. ध्यान अवस्था में रहने का नियमित रूप से  अभ्यास करते हैं । (ध्यान अभ्यास )
DD. हमें  अपार आनन्द निरंतर  तब प्राप्त होता है, जब हम गुरु के मार्गदर्शन से, अन्तर्मुख हो कर
1.  समर्पण भाव से ‘योग’ करते हुए  प्रत्येक विचार, वचन, कार्य ,क्रिया
     तथा फल को प्रभु के साथ जोड़ कर नित्य एकत्व साधना करते हैं, (नित्य एकत्व )
2.  प्रत्येक घटना में  समता भाव से प्रभु कृपा का दर्शन करते हैं , और ( कृपा दर्शन )
3.  कुछ भी न चाहते हुए ,सहज स्नेह से नाम कमाई करते है  !   ( नाम कमाई )
इन ज्ञान सूत्रों को आचरण में लाना गृहस्थ संत के लिए नितांत आवश्यक है।
ये मौलिक सिद्धांत निरंतर स्मरण रहे और इनसे प्रेरणा मिलती रहे,
इस उद्देश्य से पूज्य बाबूजी ने गोस्वामी तुलसीदासजी की विनय पत्रिका
से निम्नलिखित पद  फ्रेम करवा कर अपने पूजा मंदिर में रखा था :—
कबहुँ कहों यह रहनी रहौंगो ,
श्रीरघुनाथ कृपाल कृपा ते संत स्वाभाव गहोंगो।
जथा लाभ संतोस सदा, काहूसों कछु न चाहौंगो।
परहित निरत, निरंतर मन क्रम, वचन नेम निबहोंगो।।
परुख वचन, अति दुसह श्रवण सुनी, तेहि पावक न  जारोंगो।
विगत मान सम, सीतल मन, पर गुन नहीं दोस कहोंगो।।
परहरि देह जनित चिंता, दुःख-सुख सम बुद्धि सहोंगो।
तुलसीदास प्रभु यह पथ रही अविचल हरी भगति लहौंगो।।
कबहुँ कहों यह रहनी रहौंगो ,
श्रीरघुनाथ कृपाल कृपा ते संत स्वाभाव गहोंगो।
जथा लाभ संतोस सदा, काहूसों कछु न चाहौंगो।
परहित निरत, निरंतर मन क्रम, वचन नेम निबहोंगो।।
परुख वचन, अति दुसह श्रवण सुनी, तेहि पावक न  जारोंगो।
विगत मान सम, सीतल मन, पर गुन नहीं दोस कहोंगो।।
परहरि देह जनित चिंता, दुःख-सुख सम बुद्धि सहोंगो।
तुलसीदास प्रभु यह पथ रही अविचल हरी भगति लहौंगो।।

Preparations for Dhyan – The Meditative State

पूज्य बाबूजी (गुरुदेव) ने बताया था, “ ध्यान किया नहीं जाता, वह तो होता है !”

As such, one has to remember that we do not perform meditation ;
we, in fact,  get into the meditative state. ध्यान कर्म नहीं है, वह तो एक क्रिया है.
We can well appreciate Pujya Babuji’s logic for the first prompt in the
audio cassette on MEDITATION. He says with utmost seriousness :–
                                   ” अन्तर्मुख हो जाओ ! “
However, permit me to submit that we have to make certain prior
preparations, which are conducive to getting into meditative state.
क्योकि पूज्य बाबूजी अनेक दशकों से ध्यान अवस्था में रहते थे, अतः स्थान-समय-वातावरण
आसन आदि पहले से नियत होते थे। …….   और मुझे उनके साथ ध्यान करने का जब-जब
सौभाग्य प्राप्त हुआ तब वे ध्यान की तैयारी पहले ही कर चुके होते थे ………….………
मैंने यदा-कदा ही इन बारीकियों पर उनसे चर्चा की होगी, अब स्मरण नहीं है पर
उनसे प्राप्त कुछ पुस्तिकाओं के पढ़ने पर Everything fell in place.
Let me try to recapitulate and collate those learnings and tips.
ज्ञानी योगियों ने, विचारकों ने, अनुभव कर्ताओं ने, मनीषियों ने जो बातें लिखी हैं
या अपने प्रवचनों के माध्यम से बताई हैं, उनके अनुसार, आधुनिक युग में
जो तैयारियाँ व्यवहारिक हैं और जानने योग्य है, वे निम्न लिखित हैं :——
स्थान – शोर-गुल से दूर, एकान्त – जहाँ वाहन आवागमन के हॉर्न,
टेलीफोन इत्यादि की ध्वनि, जानवर-जीव-जंतु की आवाज़ का विघ्न न हो ,
 Secluded, quiet place with no external communication.
वातावरण – ना बहुत गरम ; ना बहुत ठंडा ; आँधी – बारिश रहित मंद वायु ;
Cool pleasant environment devoid of filthy odour.
Avoid closed area, which is stuffy and lacks in fresh air.
आसन – ऐसा हो जिस पर सुख पूर्वक बैठ सकें, यदि ज़मीन पर बैठ रहे हैं
तो स्थान को साफ़ करके चटाई, आसनी, yoga mat , रूई की गद्दी
अथवा कम्बल पर सूती बेड कवर या चादर बिछाना उपयुक्त होगा।
Clean place, properly swept is desirable. It is a taboo
to sit on the ground or floor as it will drain the positive
Posture – Should be such that the back bone can remain
erect and there is no pain in the muscles or joints.
Although पद्म आसन , सुख आसन, वज्र आसन are considered
ideal, however, there is no hard and fast rule.
What is important is that one should be able
to sit comfortably relaxed for long duration.
Moreover, use of chair is not a taboo.
Some Yogis including Sri Aurobindo are known
to have used armed chair while sitting for meditation.
समय – अभ्यास के लिए ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से दो घंटे पूर्व), और
संध्या ( गौधूलि बाद) और रात्रि की वेला को उपयुक्त माना गया है।
शरीर शौच-लघुशंका से निवृत होकर दाँत-मुँह-गला , नाक-आँख
साफ़ करके कुल्ला करके बैठने की सलाह गुरुजनों ने दी है। वाह्य स्वछता स्नान से
मिलती है, पर  स्नान करना अनिवार्य नहीं है, स्नान उपरान्त स्फूर्ति बनी रहती है ;
तथा आलस्य दूर रहता है। आतंरिक शुद्धता स्नान से नहीं, नाम जप से मिलती है
In the last century, several enlightened souls could meditate
effortlessly any where and at any point of time.
The statement is relevant for many सिद्ध गुरु of this century.
बाबूजी का  quotable quote था “ जिससे प्रेम होता है, उसकी बार-बार याद आती है।  
जिसको बार-बार याद करते हैं उससे प्रेम हो जाता है ! “
उनको पाने की अभीप्सा इतनी बढ़ जाये कि जैसा पिछले ब्लॉग पोस्ट में
पारम्परिक चेतावनी को सन्दर्भ सहित याद किया था :
” रे मन प्रभु से प्रीत करो , प्रभु की प्रेम-भक्ति-श्रद्धा से अपना आप भरो !”
” ऐसी प्रीति करो तुम प्रभु से प्रभु तुम माहि समाऍ,
 ” बने आरती-पूजा जीवन, रसना हरिगुन गाये,
” रामनाम आधार लिए तुम इस जग में बिचरो,
रह न सको बिन प्रभु के तुम भी ऐसा ध्यान धरो !”
जो भक्त ” नित्य एकत्व ” साधना में संलग्न होते हैं,
वे सच्चिदानन्द परमात्मा के साथ ‘योग’ करते हुए,
सतत अर्थात प्रत्येक क्षण ‘ध्यान’ अवस्था में रहते हैं  !
यहाँ एक साधारण पर महत्वपूर्ण बात जान लें कि  ‘योग’
शब्द संस्कृत भाषा की ‘यजु’ धातु ( verb ) से बना है,
उसका शाब्दिक अर्थ है ‘ जोड़ना ‘। सरल भाषा में
यदि समझना हो तो ” योग तब होता है ………… 
जब हम मन-वचन-कर्म या आचार, विचार, क्रिया 
एवं फल को सच्चिदानन्द परमात्मा से जोड़ते हैं ! “
महर्षि पतञ्जलि ने योग के 8 अंग बताये हैं :–
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधी
यहाँ यह माना जा रहा है कि यम-नियम  आदि योग के अंग के प्रथम
6 अंगों के बारे में विस्तृत जानकारी अभ्यास कर्ता ने हासिल कर ली है।
और वह उनको आचार-विचार-व्यवहार में ला रहा है।
Let us discuss in detail the ATTITUDINAL aspect of Meditational State
and the “corner stone” YOGA with its significance for नित्य एकत्व  साधना .
भले ही आधुनिक युग में ” योगा ” शब्द बहुत सुना जा रहा हो पर
साधक भक्त जानते हैं कि प्रत्येक व्यायाम को योगाभ्यास नहीं कह सकते।
भक्त / संत कैसे अपना प्रत्येक कार्य ‘योग’ के साथ कर सकते है अथवा करते  हैं ,
इसका प्रमाण संत कबीरदासजी को संत जेना बाई से हुई भेंट में मिला था।
स्वामी अखण्डानन्दजी के शिष्य स्वामी गिरीशानन्दजी ने रेनुकूट में श्रीमदभागवत पुराण पर
प्रवचन करते हुए महाराष्ट्र की संत जेना बाई की संत कबीरदास से हुई भेट का वृतांत सुनाया था।
कबीरदासजी ने जेना बाई की साधना प्रसिद्धि सुनकर उन के साथ सत्संग करने का तीर्थ यात्रा का
कार्यक्रम बनाया।  जब वे जेना बाई के गॉव पहुँचे तो जेना बाई का पता पूछा। उनके निवास के पास
पहुंचकर, उनकी पहचान पूछी तो एक सज्जन ने कहा ” उधर घर के सामने जो दो महिला खड़ी हैं,
उनमे एक जेना बाई है ! “
संत कबीरदासजी जब उन महिलाओं के पास पहुंचे तो दोनों में ऊपले ( कंडों ) के कारण वाकयुद्ध
चल रहा था। दोनों किन्ही उपलों को अपना बता रहीं थी।  लगभग 10 मिनिट तक वाक्द्वंद सुनकर
कबीरदासजी को जेना बाई की पहचान मिल गयी और वे मध्यस्तता करने के उद्देश्य से अपना परिचय
देने लगे।  जेना बाई ने कबीरदासजी को यह कह कर टोक दिया ” कबीरदास ज़रा धैर्य रखो, मुझे बात
करके समस्या सुलझाने दो ! ” कबीरदासजी ने मन ही मन सोचा ” कहाँ आगये ? किसी ने ग़लत ही
इनको पहुंची हुई महिला संत बता दिया, ये तो साधारण से ऊपले पर झगड़ा कर रहीं हैं ! “
जब 10 मिनिट और देखने के बाद कबीरदासजी से नहीं रहा गया तो बोले ” मैया ! गोबर के उपले
तो एक जैसे ही नज़र आते हैं ; कोनसा किसका है ये पहचान नहीं हो सकती ! ” संत जेना बाई बोली,
” कबीरदास मैंने तो सुना था की तुम बहुत ज्ञानी भक्त कवि हो, पर तुम तो उलटे ही निकले !
कबीरदास दो -दो करके उपले उठाओ और कान पर लगाओ। ” जब कबीरदासजी में कान पर उपले
लगाये तो कुछ से ‘ विट्ठल-विट्ठल ‘ की ध्वनि सुनाई दी।  वे आश्चर्य चकित रह गए।  संत जेना बाई
ने कहा ” कबीरदास जिन उपलों से ध्वनि आ रही हो उन्हें अलग रखते जाओ वे मेरे हैं ! अरे मैं कोई
उपले थोड़ी बनती हूँ ; मैं तो ‘विट्ठल-विट्ठल’   का कीर्तन करती हूँ ; वो तो ताली बजाते में गोबर
हाथों के बीच आ जाता है इसलि ए उपले बन जाते हैं ! मुझे विट्ठल देव का प्रसाद बनाने के लिए
उपले चाहिए होते हैं।  मैं प्रसाद उन्हीं उपले से बना सकती हूँ जिनसे विट्ठल नाम धुन निकलती हो,
इसीलिये मैं पड़ोसन से अपने उपले देने को कह रही थी। कबीरदासजी को संत जेना बाई की महानता
और प्रभु प्रेम की लौ का परिचय प्राप्त हुआ तथा काशी से चलकर महाराष्ट्र आना सार्थक सिद्ध हुआ।

प्रातः स्मरणीय पूज्य अम्मा ध्यान की प्रक्रिया को नित्य एकत्व साधना की महत्वपूर्ण कड़ी जानती थीं।

उनका प्रिय भजन था :– भगवन तुम्हारे ध्यान में आठों प्रहार रहा करूँ  !

पूज्य अम्मा गृहस्थ किसान भक्त की एक कथा सुनती थीं …………

ऐसा माना जाता हैं कि देवर्षि नारद हाथ में वीणा लिए ” नारायण नारायण ” कहते हुए
देवलोक और मृत्यलोक में विचरते रहते हैं और उनके पास ख़बरों का अपार भंडार रहता है।
एक बार नारदजी को लगा कि कलियुग (वर्तमान समय में ) उनसे बड़ा कोई भी भक्त नहीं है ,
अतः इस विचार को प्रामाणिक बनाने के उद्देश्य से वे विष्णु लोक में भगवान नारायण के पास पहुंचे।
अन्तर्यामी प्रभु और लक्ष्मी मैया को नारदजी के मन में अभिमान अंकुरित होने का संकेत पहले ही
मिल गया था। जब नारदजी ने अभिमान सहित भगवान से सबसे बड़ा भक्त जानने की जिज्ञासा व्यक्त
की तो भगवान ने उनको भारत के एक किसान का नाम बताया।  नारदजी को बड़ा विस्मय हुआ और
स्वाभाव अनुसार वे किसान की दिनचर्या का अनुसंधान करने उसके घर पहुंचे।  नारदजी ने देखा कि
सुबह उठने पर, किसान ने धरती को प्रणाम करके अपने माता-पिता को प्रणाम करके ” राम-राम “
कहा और शौचादि से निवृत हो देव स्थान में प्रणाम करते हुए ” राम-राम ” कह कर खेत में काम
करने गया।  शाम को खेत से लौटने पर पुनः देव स्थान में प्रणाम करके “राम-राम ” कहा और फिर
माता-पिता को प्रणाम करते हुए ” राम-राम ” कहा।  रात को खाना खाकर ” राम-राम ” कह कर
चारपाई पर लेटते ही सो गया। दुसरे दिन फिर वही दिनचर्या देख कर नारदजी को आश्चर्य हुआ
और वे शीघ्रता से विष्णुलोक वापिस पहुंचे।
इसके पहले कि नारदजी कुछ कह पाते, लक्ष्मीजी ने तेल से भरा एक कटोरा दिया और कहा,
” नारद ! मैं तुम्हे ही याद कर रही थी।  मुझे प्रभु के प्रिय भक्त से एक अनुष्ठान करवाना है
……………… .……………. इस कटोरे को लेकर ब्रह्माण्ड के तुरन्त 7 चक्कर लगा कर
वापिस आओ पर पूरी सावधानी रखना, जिससे कटोरे से तेल की एक बूँद भी गिरने न पाये।
नारदजी ” जो आज्ञा ! ” कह कर निकले और शीघ्रता से कार्य संपन्न करके लक्ष्मी मैया के समक्ष पहुंचे।
उन्होंने कहा, ” मैया ! आपका अनुष्ठान बिना विघ्न के संपन्न हो गया, तेल की एक भी बूँद नहीं गिरी। “
लक्ष्मी मैया ने जैसे ही उन्हें धन्यवाद दिया, प्रभु ने पूछा ” क्या  किसान से मिले ?
उसे काम करते देखा था ? “नारदजी ने बताया कि उन्होंने किसान को दूर से देखा था,
पर व्यंग-रोष की मिश्रित भाषा में नारदजी बोले ” भगवान आप भी मज़ाक करते हैं !
दिन भर में 5 बार “राम-राम “कहने वाले को अपना सबसे बड़ा भक्त कह रहे हैं ?
जब कि मैं लाखों बार आपका नाम जपते हुए सारे लोकों में भ्रमण करता हूँ ! “
प्रभु ने कहा, ” नारद ! हल जोतते, बीज बोते, सिचाई करते, अनाज काटते हुए ,खेती और
पारिवारिक काम करते हुए वह  मेरा स्मरण तो करता ही है, अपने परिवार और देश की
जनता के लिए शक्ति-वर्धक अनाज से सुन्दर स्वस्थ की निरंतर मंगल कामना करता है। “
इस बार मैया की बारी थी, उन्होने पूछा, ” नारद अभी जब अनुष्ठान करते समय ब्रह्माण्ड के
तुमने 7 चक्कर लगाये थे, तब तुमने कितनी बा में र प्रभु का नाम लिया था ? ”  नारदजी मौन थे।
मैया ने कहा ” नारद ! गृहस्थ जीवन की ज़िम्मेदारी के साथ, समर्पण भाव से शुभ संकल्प और
कर्तव्य परायण हो कर परिवार की सेवा करना और प्रभु के स्मरण का दिखावा नहीं करना,
बहुत कठिन तपस्या है। नारदजी को ग़लती का अहसास हुआ और उनका अभिमान चूर हो गया।
मेरा निवेदन है एक बार ब्लॉग पोस्ट ” नित्य एकत्व साधना “ का पुनरावलोकन करें जिसमें
श्री श्री आनंदमयी माँ ने बाबूजी को नित्य एकत्व साधना के लिए गृहणी माँ और शिशु का
उदाहरण दिया था।
We may notice the role reversal, if we go through Ramcharit Manas.
रामचरित मानस के अरण्य काण्ड में जब नारदजी ने प्रभु श्रीराम से पूछा था :—
      ” जब विवाह मैं चाहन कीन्हा, प्रभु केहि कारण करे न दीन्हा ? “
तब श्रीराम ने अपनी ज़िम्मेदारी उजागर करते हुए कहा था : —-
      ” सुन मुनि तोही कहहुँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।
        करहुँ सदा तिन्ह कै रखवारी।  जिमि बालकहीं राखी महतारी।।
यदि श्रीमद्भगवत गीता के बारहवें अध्याय के 4 श्लोकों ( 8 से 11 ) का अध्यन करें तो
नित्य एकत्व साधना के लिए पूर्ण दिशा निर्देश मिल जाते हैं।  एक बार 12 / 8 श्लोक को पढ़ें  :–
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।
श्रीहरि गीता के 12 / 8 से 11 छंद निम्न लिखित हैं  :—
मुझमें लगाले मन, मुझी में बुद्धि को रख सब कहीं। मुझमें मिलेगा फिर तभी इसमें कभी संशय नहीं।।
मुझमें धनंजय ! जो न ठीक प्रकार मन पाओ बसा। अभ्यास-योग प्रयत्न से मेरी लगालो लालसा।।
अभ्यास भी होता नहीं तो कर्म कर मेरे लिये।  सब सिद्धि होगी कर्म भी मेरे लिए अर्जुन ! किये।।
यह भी न हो तब आसरा मेरा लिये कर योग ही।  कर चित्त-संयम कर्म-फल के त्याग सारे भोग ही।।
With the aforesaid physical and mental preparedness, we are ready to step
into the Meditative state. ध्यान हो सके इस प्रक्रिया को initiate गुरुदेव करते हैं !


The most IMPORTANT question that everyone faces either from

within or during interaction with an inquisitive person is :

                  WHAT IS THE OBJECTIVE OF LIFE ?
When we go down the memory lane, we recall blessings, given
in yesteryears by elders, can be categorized into 2 sets :
Life and health related                Happiness & status related
जीते रहो !                                       खुश रहो !
Get well soon !                             सदा सुहागिन और सुखी रहो !
May God grant u a long life !        खूब बड़े हो जाओ !!
पुरानी  कहावत है ….…  पहला सुख  : “निरोगी  काया “
As such, to everyone, welfare meant good health and long life
so that one may contribute to the family, society, profession,
organization and larger community, even one’s nation by adding
value for improvement in one’s own humble way.
In the yesteryears, whenever anyone paid respects to elders
in the family, the blessing to kids, youth & grown-ups, whether
married or unmarried, universally was ” खुश रहो!”
If we search our heart, we realize that we pray to the Almighty,
who is सच्चिदानन्द (सत चित आनन्द). And, as we discussed in the
very first post, मैं देह नहीं; देही हूँ।  ईश्वर अंश होने के कारण , स्वभावतः
आनन्द मग्न‘ रहने की आकांक्षा हैं ! बोलचाल की भाषा में ‘खुश रहना‘ चाहते हैं।
I recall the actions and dialogues of innocent young kids :
उनका सर्वप्रथम उद्देश्य था : वे ‘बड़े’ बनाना चाहते थे !
बेटियाँ साड़ी पहन कर और बिंदी लगाकर ‘बड़े’ होने का अहसास करती थीं
पुत्रगण मुँह से आवाज़ निकालते हुए सेंटर टेबल को स्टीयरिंग व्हील बना कर
‘कार चलाते हुए’ पिता को कॉपी करते थे।  किसी कमरे की दीवार को
ब्लैक बोर्ड बना कर बच्चों द्वारा टीचर बनने का नाटक करना, घर घर की कहानी है ।
उनका दूसरा उद्देश्य था : ‘बड़ी चीज़ों ‘ के सपने देखना और उससे खुशहोना
They dreamt of big house, big car, travel by aero plane, have
ख़ुशी का माहौल-मस्ती with parents  and lots of relatives & friends.
I recall a Hindi essay written by a convent school going student
from an affluent family  on ” ग़रीब किसान। “
उसका निबंध कुछ इस तरह था  ………….
एक ग़रीब किसान था।  उसका खेत छोटा था।  उसका घर भी छोटा था …
जिसमें ………….छोटा ड्राइंग रूम, छोटा डाइनिंग रूम, छोटा बेड रूम था।
She had absolutely no idea that a poor farmer could afford to live
in just a small hut in stead of her perception of a small house
with several small rooms.
उनका  तीसरा  उद्देश्य था : मित्र मण्डली को खुश करना। 
मुझे याद आ रहा है अपनी भतीजी गौरी (जो तब  4 /5 वर्ष की थी ) और
(श्री मोदी के सुपुत्र) सहपाठी  ‘गुड्डू’ के साथ हुआ मासूमियत पूर्ण वार्तालाप
गुड्डू  : ”  गौरी !   जब हम तुम्हारे यहाँ आएंगे, तो हमें क्या खिलाओगी ? “
गौरी : ” हम तुम्हें रसगुल्ला, गुलाब जामुन, कचौड़ी और पकौड़ी खिलाएंगे “
गुड्डू  : ” और जब तुम हमारे यहाँ आओगी, तो तुम क्या लाओगी  ? “
गौरी : ” तब हम, लड्डू, पेड़ा, बर्फ़ी , समोसा और दालमोठ लाएंगे ! “
इस वाकये को जब मैंने क्लब हाउस में देखा-सुना और तत्पश्चात कुछ दूर पर
बैठी मधु भाभी, मोदी भाभी और प्रभाजी- सुधाजी सुनाया तो महिला वर्ग ने
मासूमियत के आलावा कायस्थ और वैश्य जीन्स के प्रभाव को भी याद दिलाया
कि ‘ ख़ुशी ‘ कैसे मिलेगी  !
लगभग 42  /44  वर्ष  बाद गुनन करने पर यह अहसास होता है कि दूसरे को
खुश करने और स्वयं खुश होने की प्रवृत्ति भिन्न हो सकती है , पर मेरे मत में
बच्चों का इस वार्तालाप का मुख्य उद्देश्य ख़ुशी का माहौल बनाना ही था !
जब हम अपने आपको शरीर से अथवा अपने आपको अंतःकरण के पहले विभाग ‘मन’ से
identify करते हैं, तो वस्तु, व्यक्ति एवंपरिस्थिति से प्राप्त शारीरिक सुख
( नेत्रों को सुन्दर चित्र, प्रेमी-प्रेमिका अथवा स्थान, जिव्या को स्वादिष्ट व्यंजन,
कानो को सुमधुर वाद्य संगीत बजना अथवा गायन, सुगन्धित इत्र-perfume
or aroma, soft cushion-bed, cool breeze, pleasant weather etc.)
हमें ख़ुशी प्रदान तब तक प्रदान करते हैं, जब तक हम उन विषयों के प्रभाव में रहते हैं
और उनके सुख का अनुभव करते हैं। परन्तु जैसे ही विषय प्रभाव हीन  होता है अथवा
जब किसी कष्ट-रोग-शोक-आशंका से मन घिरता और चिंतित होता है,
ख़ुशी की अनुभूति को विराम लग जाता है।
From the foregoing discussion, we can infer that the worldly objects
do give us joy as per their intensity, the phase of life, attitude and
urge that we have. However, by nature, as the worldly objects are
FINITE, they cannot provide infinite joy. And we are back to square one,
once their effect ceases. Therefore, it is a futile exercise to search for
everlasting and INFINITE आनन्द in the worldly objects, be it wealth,
movable or immovable assets, money, house, vehicle, machines,
gadgets, position, status, relatives, acquaintances, colleagues,
friends, situation, environment, corporate, institution, company, etc.
Logically, FINITE  सांसारिक – वस्तु, व्यक्ति एवं परिस्थिति can provide
शारीरिक सुख and to limited extent मानसिक शान्ति ; but CAN NOT
provide the main objective, which is INFINITE ख़ुशी (आनन्द )
now as also for all times to come.।
जब हम अंतःकरण के चौथे विभाग ‘अहं’ से identify करके ईश्वर का अंश होने
के सत्य को याद करते हैं तो आनन्द प्राप्त करने की छटपटाहट भी बढ़ती  है।
If we dwell on this issue in depth, we realize that we, who are
सच्चिदानंद  के अंश, we  were आनन्दित like HIM until HE separated
us from HIS INFINITE self and sent into this world. Being used
to the attribute of सच्चिदानन्स्वरुप परमात्मा, ईश्वर का अंश आत्मा ( देही )
on having been separated from HIM misses the significant element
आनन्द ( ख़ुशी ) in this world. As such, there is an in-built natural
aspiration for आनन्द (ख़ुशी)  and therefore through various phases
of life and from every object that  the human being comes across
in this world, it desperately seeks आनन्द (In common parlance ख़ुशी ).
I must admit, I have asked this most IMPORTANT question, during
meeting with several relatives, friends and acquaintances  :
Many of my team members be it peers, seniors or juniors,
at first mentioned their professional or family goals ; but during
subsequent discussions, they would modify their answers
to include the other long term goals as they tended to include
the other role plays. I tried to collate commonalities from their
answers and added my own philosophical learnings.
The ultimate objective were salvation & ever-lasting joy ;
but short and medium term objective of life that emerged was :—-
To improve quality of life for own self and creations around !
Gauge for improving quality of one’s life is :
1. Health related – Regular exercise ( योग-प्राणायाम-भ्रमण ) and healthy food,
good habits with regulated life for work, rest, pleasure or entertainment,
devoid of any serious disease, handicap or addiction to tobacco, drugs, etc.
2. Growth of ASK ( Attitude, Skills and Knowledge) triangle. For this aspect,
comparative triangles needed review. यदि स्वाध्याय से ज्ञान बढ़ता है, स्वधर्म पूर्ण क्षमता
से करते हुए कुशलता बढ़ती  है, और सदविचार, वचन-व्यवहार से सकारात्मक प्रवृत्ति बढ़ती है
तो ये निष्कर्ष निकलता है कि स्वयं के जीवन की गुणवत्ता बेहतर हो रही है।  
Gauge for “improving quality of creations” around is :
1. The immovable assets – house, farm, plant, office etc.
being made more presentable and useful for the owner.
2. The movable assets – car, carriage, boat, aero plane etc.
being renovated, improvised or made more efficient.
3. The animals – groomed & provided better food-home,
and made more human friendly with enhanced utility.
4. For humans – relatives or friends, the increase in the width
of smile and frequency of smile and laughter would constitute
improvement in quality of life.
Combining the short, medium and long term goals, we seek
ailment free long life, improvement in quality of life …..आनन्द।
Spreading joy (ख़ुशी) all around …………..आनन्द।